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सोमवार, 25 जून 2012

क्या सचमुच ब्रह्मेश्वर सिंह दलितों के गुनाहगार थे?




रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया जी की हत्या निश्चित तौर पर कानून की नजर में गुनाह है। फिर भी सवाल यह है कि सामाजिक तौर पर इसे जायज ठहराया जाए या नाजायज? उग्रवादियों के खून से होली खेलने वाले मुखिया की खूनी दास्तान इस सवाल को बल देती है।

दास्तान के पीछे की सच्चाई को जानने के बाद सवाल उठता है कि क्या सचमुच मुखिया ‘दलितों के गुनहगार’ थे? या फिर उग्रवाद के खिलाफ छिड़ी इस जंग को राजनीतिक ताकतों ने जातीय हिंसा का रूप दे दिया? क्या सचमुच मुखिया की हत्या से दलितों ने ‘राहत’ की सांस ली है? क्या सचमुच एक ऐसे शख्स की हत्या हुई है, जिसे समाज ने ‘समाज का दुश्मन’ माना है? या फिर हत्या पर महज सियासत हो रही है? कहा तो यह भी जा रहा है कि ‘खून का बदला खून’ से लेने का आह्वान करने वाले मुखिया जी सही थे। उन्होंने बंदूक के सहारे शांति कायम करने के लिए जिस प्रकार नरसंहारों का सहारा लिया, वह जायज था। ऐसे सवाल बिहार के सियासी गलियारों से लेकर आमलोगों की जुबान पर दौड़ रहे हैं।

खुले तौर पर कहा जाए, तो मुखिया के समर्थक उन्हें गरीबों और कमजोरों का मसीहा मानते थे। वहीं एक वर्ग ऐसा भी है, जो मुखिया को खून की नदियां बहाने वाला दुर्दांत अपराधी मानता रहा है। यानी, मुखिया को समाज का हर तबका अलग-अलग रूप में देखता और समझता है। ऐसे में मुखिया को मसीहा या फिर आतंक का पर्याय घोषित करने से पहले उनकी पूरी दास्तां को जानना बेहद जरूरी है।

मुखिया का जन्म भोजपुर जिले के सहार में खोपिरा गांव में हुआ था। गांव के स्कूल से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने आरा को अपना ठिकाना बनाया। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद जैन कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने स्नातक में दाखिला लिया।

हालांकि, उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। इसकी वजह रही 1969 में हुई एक घटना में उनका नाम आना। यह घटना दो लोगों की हत्या से जुड़ी थी। हालांकि, बाद में कोर्ट ने मुखिया को इस मामले में निर्दोष करार दे दिया। इसी घटना ने मुखिया की जिंदगी को ‘डि-रेल’ कर दिया। इस बीच सामाजिक कार्यों से जुड़े होने और अपराध के खिलाफ आवाज बुलंद करने के कारण काफी कम उम्र में ही उनका नाम लोगों की जुबान पर आ गया था। यही वजह रही कि वर्ष 1972 में ही वे खोपिरा ग्राम पंचायत के मुखिया बन गए। उसके बाद उनकी जिंदगी सामाजिक कार्यों की ओर बढ़ती गई।

उसी समय भोजपुर में नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। वंचित तबके के लोगों ने सामंतवाद के खिलाफ हिंसक रास्ता अख्तियार कर लिया था। इसके कारण मुखिया ने भी समांतर तरीके से अपने लोगों को एकजुट करना शुरू कर दिया और उसके साथ ही शुरू हो गया जातीय हिंसा का दौर। हिंसा की इस आग ने उस वक्त प्रचंड रूप धारण कर लिया, जब 1990 में बिहार की सत्ता में लालू यादव, यानी राजद की सरकार आई।

अपनी राजनीति चमकाने और ‘फूट डालो राज करो’ की नीति पर चलते हुए लालू ने खुले तौर पर ‘भूरा बाल साफ करो’ (भू-भूमिहार, रा-राजपूत, बा-ब्राह्मण, ल-लाला) का नारा दे दिया। इस नारे ने बिहार में जातीय हिंसा की एक नई दास्तान लिख दी। जातीय संघर्ष में पहले से तप रहे बिहार को लालू के एक बयान ने इस कदर उग्र कर दिया कि नरसंहारों का दौर थम नहीं रहा था।

सवर्णों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में लालू का अप्रत्यक्ष सहयोग दलितों और पिछड़ों के लिए उस ताकत के तौर पर काम करने लगा, जिसका अंदाजा होने के बाद वे कुछ भी करने गुजरने के लिए आजाद हो गए। लालू को मसीहा के रूप में देख रहे दलितों और पिछड़ों ने आतंक की नई इबारत लिखनी शुरू कर दी।

इस दौरान 1993 और 1994 में मध्य बिहार, विशेषकर भोजपुर के कई इलाकों में दलितों और पिछड़ों का नरसंहार रौद्र रूप लेने लगा। रणवीर सेना के नाम से तैयार हुए उग्रवाद विरोधी सेना के 1995 से 2000 के बीच 28 नरसंहारों में ब्रह्मेश्वर मुखिया को आरोपी बनाया गया। इन नरसंहारों में कुल 282 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों जिंदगी तबाह हो गई।

बहरहाल, मुखिया की जिंदगी से जुड़ी यह ‘तल्ख’ सच्चाई साफ बयां कर रही है कि राजनीतिक दलों ने अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए सियासी दांव-पेंच के सहारे जातीय संघर्षों की चिंगारी में आग लगाई। एक बार फिर मुखिया की हत्या के बाद सफेदपोश खुद की राजनीति को चमकाने की खातिर जातीय संघर्ष की आग को हवा देने की कोशिश में हैं। अब यह हम और आप तय करेंगे कि हमें जातीय संघर्ष की आग में कूद कर एक-दूसरे का खून बहाना है या फिर आम लोगों की खून से राजनीति की होली खेलने वालों को सबक सिखाना है।



रणवीर सेना के नरसंहारों पर एक नजर



29.04.1995 खोपिरा, भोजपुर 5

25.07.1995 सरथुआं, भोजपुर 6

05.08.1995 नूरपुर, भोजपुर 6

07.02.1996 चरपोखरी, भोजपुर 4

09.03.1996 सहार, भोजपुर 3

22.04.1996 नोनूर, सहार, भोजपुर 5

05.05.1996 नाड़ी, भोजपुर 3

19.05.1996 नाड़ी, भोजपुर 3

25.05.1996 मोरथ, भोजपुर 3

11.07.1996 बथानी टोला, भोजपुर 21

25.11.1996 पुरहरा, भोजपुर 4

12.12.1996 खनेट, भोजपुर 5

24.12.1996 एकवारी, भोजपुर 6

10.01.1997 बागर, तरारी, भोजपुर 3

31.01.1997 माछिल, जहानाबाद 4

26.03.1997 बिक्रम, पटना 10

28.03.1997 आकोपुर, जहानाबाद  3

10.04.1997 एकवारी, भोजपुर  9

11.05.1997 नगरी, भोजपुर 10

02.09.1997 खड़ासिन, भोजपुर 8

23.11.1997 कटेसर, जहानाबाद 6

31.12.1997 लक्ष्मणपुर बाथे,   जहानाबाद 59

25.07.1998 ऐयार, करपी, जहानाबाद 3

25.01.1999 शंकरबिगहा, जहानाबाद 23

10.02.1999 नरायणपुर, जहानाबाद 12

21.04.1999 सिमदानी, गया 3

28.03.2000 सोनबरसा, भोजपुर 3

16.06.2000 मियांपुर, औरंगाबाद 33

कुल मृतक  282

भूमिहारों के ईश्वर ब्रह्मेश्वर की हत्या

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2002 में 29 अगस्त को जब पहली बार यह खबर आई कि रणवीर सेना का "मुखिया" गिरफ्तार हो चुके  है तो शायद सबके मन में एक ही सवाल था कि आखिर वह आदमी दिखता कैसा है जिसने सात आठ सालों के अंदर ही प्रतिक्रियावादी नरंसहारों की झड़ी लगवा दी थी?

 बिहार में जड़ जमाते मालेवादी हिंसा के जवाब में सवर्णों की ओर से जो जवाब दिया गया था वह इतना जघन्य था कि देखने सुननेवालों की रूह कांप जाती थी. इन जघन्य हत्याकांडों का सूत्रधार जब पहली बार दुनिया के सामने आया तो वह कहीं से चमत्कारिक नजर नहीं आया. निहायत सीधा सादा सा दिखनेवाला वह आदमी अपनी उसी सादगी का शिकार हो गया जब नवादा के कटीरा मोहल्ला स्थित उसके घर के सामने ही गोलियों से भूनकर उसकी हत्या कर दी गई. करीब नौ साल जेल में काटने के बाद ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया जी इन दिनों हिंसक रास्ते को छोड़कर सामाजिक आंदोलन की तरफ अग्रसर हो चले थे.

ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया को रणवीरे सेना का संस्थापक कहा जाता है. 1994 में रणवीर बाबा की याद में इस रणवीर किसान संघर्ष समिति का का गठन किया गया था जिन्होंने 19वीं सदी में राजपूतों से भूमिहारों के हितों की रक्षा की थी. यही रणवीर किसान संघर्ष समिति आगे चलकर रणवीर सेना के रूप में पहचाने जाने लगी. रणवीर सेना कई छोटी छोटी सेना का संयुक्त गठबंधन थी जिसमें ब्रह्मर्षि सेना, कुएर सेना, किसान मोर्चा और गंगा सेना ने अपने आपको शामिल कर लिया था और मध्य बिहार में नक्सलवादियों से भूमिहारों के हक और हित की रक्षा के लिए संघर्ष का संकल्प लिया था.

करीब आठ साल तक मध्य बिहार के जहानाबाद, पटना, रोहतास, औरंगाबाद, गया और बक्सर जिलों में रणवीर सेना की आत्म रक्षार्थ प्रतिक्रियावादी घटनाओं से दहलता रहा. माओवादी और मालेवादी हिंसा को खत्म करने के लिए रणवीर सेना ने जो हिंसक वारदातें की वह दहला देनेवाली थीं. 1995 में पहली बार बड़ी घटना को अंजाम देते हुए रणवीर सेना ने अपने मुख्यालय के निकट सरथुआ गांव के छह मुशहरों को मौत के घाट उतार दिया था.

संभवत: ब्रह्मेश्वर मुकिया प्रतिक्रियावादी हिंसा को इतने हिंसक तरीके से अंजाम देना चाहते थे कि माओवादी हिंसा भी दहल जाए. वे और उनकी रणवीर सेना इसमें काफी हद तक सफल भी रहे. दिनांक 31 दिसंबर 1997 को ब्रहमेश्वर मुखिया की उपस्थिति में रणवीर सेना ने जहानाबाद के लक्ष्मणपुर-बाथे नामक गांव में एक साथ 59 लोगों की निर्मम हत्या कर दी. यह बिहार में हुए अबतक का सबसे बड़ा सामूहिक नरसंहार है. बता दें कि इस नरसंहार के मामले में कुल 18 लोगों को आजीवन उम्रकैद की सजा दी गई है. जबकि मुख्य अभियुक्त ब्रहमेश्वर मुखिया को इस मामले में बरी कर दिया गया.

8 जुलाई 2011 को ब्रह्मेश्वर सिंह को जेल से रिहा कर दिया गया था और रिहा होने के बाद वे एक बार फिर से सामाजिक राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की कोशिश कर रहे थे. बीते 5 मई को उन्होंने अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन की स्थापना की थी लेकिन उसकी स्थापना के महीनेभर के भीतर ही उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी गई. निश्चित रूप से उनके द्वारा गठित रणवीर सेना जिस तरह से लाल आतंक पर लगाम लगाया था उसने उन्हें बिहार की ताकतवर भूमिहार जाति में ईश्वर का स्थान दे दिया था.


भांप रहे भूमिहारों की भूमिका


सियासत के अखाड़े में जब बात शह-मात की होती है, तो मौत दरकिनार कर दी जाती है। अखाड़े में विरोधी को मात देने के लिए शतरंज की हर चाल खेली जाती है। रणवीर सेना के संस्थापक एवं राष्ट्रवादी किसान संगठन के अध्यक्ष ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया जी की हत्या के बाद बिहार में कुछ ऐसी ही राजनीति चल रही है। मुखिया की मौत पर सियासी रोटियां सेंकने में तमाम राजनीतिक दलों ने ताकत झोंक दी है। भूमिहार समुदाय के वोट बचाने की लिए मैदान-ए-जंग में कूदी भाजपा किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है। चुनाव में भूमिहारों की भूमिका को भांप पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री गिरिराज सिंह ने मौत के बाद मुखिया को ‘गांधी’ की संज्ञा देने तक से परहेज नहीं किया। जदयू तो खामोश रहकर सवर्णों के साथ दलितों और महादलितों को भी खुश रखने की भरपूर कोशिश कर रहा है। न तो मुखिया के खिलाफ बयानबाजी हो रही है और न ही उनकी मौत पर आंसू बहाए जा रहे हैं।

विपक्ष को मिली ताकत : बिहार में जब सियासी बवंडर उठता है, तो इसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देती है। लंबे अरसे से यह सियासी बवंडर थम चुका था। भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार को मिले जनसमर्थन से ‘अपंग’ विपक्ष को ऐसे मुद्दे की तलाश अरसे से थी। लोकसभा चुनाव के करीब आते ही मुखिया की हत्या ने जैसे कमजोर विपक्ष को संजीवनी दे दी है। हत्या के बाद सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने तो यहां तक कह डाला कि अगर यह हत्या मेरे शासनकाल में हुई होती, तो लोग कहते कि मैंने ही कराई है। लालू ने एक ही शब्द में यह भी जता दिया कि मुखिया की हत्या किसी मामूली व्यक्ति के वश की बात नहीं। मुखिया की मौत में एक ‘सरकारी साजिश’ है। हत्या के दिन से अब तक रोज राजद नेता किसी न किसी बहाने मीडिया के सामने आकर बयान दे रहे हैं। कल तक कैमरे से दूरी बढ़ा चुके लालू भी रोज किसी न किसी मसले पर संवाददाता सम्मेलन कर मुखिया की मौत पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। साफ है कि लंबे समय बाद पाले में आए गेंद पर नेट गोल करने में राजद कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता।

धर्मसंकट में भाजपा : मुखिया की मौत से सत्ताधारी दल को भूमिहार के साथ ही सवर्ण वोट खिसकने का डर सता रहा है। इसमें सबसे अधिक नुकसान भाजपा को ही होने की आशंका है। भूमिहार, राजपूत, कायस्थ समेत सवर्ण जातियों का वोट भाजपा के पास माना जाता है। मुखिया की हत्या के बाद भूमिहार समुदाय के अलावा हर सवर्ण के मन में सरकार के प्रति गुस्सा है। खासकर, भाजपा के खिलाफ।

इसकी बड़ी वजह है, अपने वोटरों को सुरक्षा मुहैया नहीं करा पाना। बाथे नरसंहार में बरी होने के बाद राज्य सरकार ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही थी। सरकार का यह फैसला खास तौर से भूमिहार समुदाय के लोगों को कांटे की तरह चुभ रहा था। कारण, बाथे नरसंहार में मुखिया ही मुख्य साजिशकर्ता माने गए थे।

यह वही ब्रह्मेश्वर मुखिया हैं, जिन्होंने शुुरुआत से लेकर अपने सक्रिय रहने तक भाजपा के कई कद्दावर नेताओं को सियासी जमीन मुहैया कराई। अब मुखिया की मौत के बाद भाजपा नेताओं की इस हरकत ने भी भूमिहार समुदाय को गहरी ‘चोट’ दी है। ऐसे में भाजपा को भी सवर्ण वोट खिसकने का भय सता रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी भूमिहारों के गुस्से को जायज ठहराते हैं। जबकि, भाजपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री गिरिराज सिंह ने मुखिया को ‘गांधी’ कहकर भूमिहार समुदाय को परोक्ष रूप से ताकत देने की भरपूर कोशिश की।

कांग्रेस खुश, नीतीश खामोश : मुखिया की मौत को लेकर कांग्रेस भी पीछे नहीं है। भड़के भूमिहारों को अब ऐसे राजनीतिक दल की तलाश है, जो उनके समर्थन में हर वक्त खड़ा रहे। अब उनकी नजर कांग्रेस पर है। कांग्रेस भी इस मौके को भुनाने की भरपूर कोशिश कर रही है।

सूत्र बताते हैं कि बिहार कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता लगातार केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में हैं। जल्द ही बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष भी चुना जाना है। ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि भूमिहारों के बढ़ते आक्रोश और विकल्प की तलाश के बीच कांग्रेस का अध्यक्ष पद किसी भूमिहार नेता को ही सौंपा जाए। वहीं मुखिया की हत्या के बाद उठे सियासी बवंडर में अगर किसी की नाव सबसे अधिक खतरे में है, तो वह हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। यही वजह है कि हत्या के दिन से ही नीतीश समेत जदयू के तमाम नेता खामोश हैं।

सरकार के निर्माण में भूमिहारों की भूमिका को भांप नीतीश हर कदम फूंक-फंूक कर रख रहे हैं। उन्होंने न तो मुखिया की मौत पर तीखा बयान दिया, न ही मौत पर आंसू बहाए। कारण, अगर नीतीश, मुखिया को नरसंहारों का आरोपी मानते हुए कोई बयान देते, तो भूमिहारों का गुस्सा ज्वालामुखी बन जाता। अगर उन्होंने मुखिया की मौत पर आंसू बहाए, तो पिछड़े और महादलितों का वोट बैंक खिसक जाता।

रणवीर सेना प्रमुख हत्या की जॉंच सी0 बी0 आई0 से कराने को लेकर एक दिवसीय सांकेतीक धरना


रणवीर सेना प्रमुख हत्या की जॉंच सी0 बी0 आई0 से कराने को लेकर एक दिवसीय सांकेतीक धरना


भुमिहार बाहुल्य क्षेत्र बड़हिया में रणवीर सेना प्रमुख रहे ब्रहमेष्वर सिंह मुखिया की आरा में  प्रातः शुक्रवार को हत्या की आग धिरे-धिरे सुलगने लगा है । जिसके तहत सी0 बी0 आई0 जॉंच की मॉंग को लेकर बड़हिया के प्रमुख बुद्धिजीवियों के अहवान पर ष्षनिवार को थाना के सामने जहॉं सौकड़ों लोगों ने ष्षांतिपूर्ण एक दिवसीय सांकेतिक धरना प्रदर्षन किया तो वहीं दर्जनों  उत्तेजित युवकों ने  नगर पंचायत चौक पर एन0 एच0 80 को आधे घंटे तक वाहन रोक कर जाम कर दिया साथ हीं बड़हिया बाजार के व्यवसायीक प्रतिष्ठानों को बंद कर दिया । जिससे एका-एक जन जीवन ठहर सा गया । हलॉंकी पुलिस हस्ताक्षेप से जाम को हटा दिया गया । और धीरे-धीरे व्यवसायीक ने भी दो घंटे के बाद अपने-अपने प्रतिष्ठान खोल दिया । तब जाकर लोगों ने राह की सॉंस लिया ।शनिवार को प्रखंड के सौकड़ों बुद्धिजीवि एवं विभिन्न पार्टी के कार्यकर्त्ताओं ने थाना के ठीक सामने सुरजीमणी मकान के बरामदे पर ब्रहम्ेाष्वर सिंह मुखिया हत्या के विरोध में सी0 बी0 आई0 जॉंच की माूंग को लेकर एक दिवसीय सांकेतिक धरना प्रदर्षैन किया । जिनमें एक स्वर से लोगों ने कहा जब तक हत्या की जॉंच सी0 बी0 आई0 से नहीं होती है तब तक चरण बद्ध आन्दोलन चलता रहेगा । सांकेतिक धरने में कृष्ण मोहन सिंह सचिदानंद सिंह मुखिया , अषोक कुमार, संजीव कुमार, पूर्व नपं उपाध्यक्ष प्रमोद कुमार, नवर्निवाचीत वार्ड आयुक्त हरेष कुमार, राजीव कुमार, प्रखंड कांग्रेस अध्यक्ष नरेष सिंह, गंगासराय पेक्स अध्यक्ष विनोद कुमार ,डॉं0 विनोद कुमार, संजीव कुमार,धरम कुमार, संजय कुमार, लड्डु कुमार, सहित सौंकड़ों लोग उपस्थित थे । इसी बीच  सांकेतिक धरना पर बैठे दर्जनों युवकों ने उत्तेजित होकर सीनेमा हॉल के निकट दुकाने बंद कराते नपं चौक पहुचे जहॉं ट्रैक्टर को रोककर एन0 एच0 80 को जाम करते हुए बड़हिया बाजार में व्यवसायीक प्रतिष्ठानों को बंद कर दिया । स्थानीय पुलिस ने सड़क जाम की घटना सुनते हीं जाम स्थल पर पहुचकर बल पूर्वक जाम को हटाया । तब जाकर 30 मिनट के बाद वाहन का परिचालन हो सका । दो घंटे के बाद व्यवसायीकों नें धीरे-धीरे अपने-अपने प्रतिष्ठान को खोल दी । इधर सांकेतिक धरने पर बैठे वहीं कृष्णमोहन सिंह ने ब्रहमेष्वर मुखिया किसानों को कर मुक्त खेती , कृषि उत्पाद का मुल्य र्निधारण किसानों के हाथ तथा सरकार द्वारा घोषीत किसान विकास की योजना किसानों के हाथ संपन्न करने के लिए अखिल भारतीय राष्ट्रवाद किसान महासंघ का जो  सपना था हमलोग टुटने नहीं देंगे

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

“जै परशुराम, जै भूमिहार” के नारे के साथ रणवीर सेना कर रही एक नयी शुरुआत, 2900 लड़ाकों की बहाली करेगी रणवीर सेना


निस्संदेह यह खबर बिहार वासियों के लिये  है कि संगठन एक बार फ़िर से बिहार में सर उठाने की कोशिश में जूट गया है। हांलाकि यह कहना गलत होगा कि रणवीर सेना पिछले पांच सालों तक इसलिये चुप रहा कि राज्य में नीतीश का सुशासन था। जमीनी हकीकत यह रही कि सत्ता में शामिल रहे भूमिहार समाज के लोगों के वजह से इस खूनी संगठन ने अपनी कोई कार्रवाई नहीं की। अब जबकि भूमिहार समाज का नीतीश कुमार से मोहभंग हो गया है तब इसने फ़िर से आवाज उठाना शुरु कर दिया है।

 बिहार रणवीर सेना ने अपनी वापसी के लिये एक नयी कार्ययोजना पर अमल करना शुरु कर दिया है। इस योजना के तहत अगले एक साल में वह अपने दस्ते में 2900 लड़ाकों की बहाली करेगा। इसके अलावा अत्याधुनिक हथियारों आदि की खरीद के लिये इस संगठन ने इन्टरनेट पर एक विशेष व्लाग जारी किया है। ब्लाग का शीर्षक है – जै परशुराम, जै भूमिहार। इस ब्लाग पर ब्रह्मोश्वर मुखिया को भूमिहार समाज का शान बताया गया है। इसके अलावा इस ब्लाग पर भूमिहार समाज के स्वर्णिम इतिहास के साथ रणवीर सेना के गठन का उद्देश्य एवं इसकी उपलब्धियों को दिखाकर प्रवासी भूमिहारों से खुले दिल से मदद करने की गुहार लगाई गई है। इसके एवज में रण्वीर सेना के संचालक ने लोगों से अपील किया है कि उनकी जमीन पर नीतीश कुमार की बुरी नजर लग गई है और बिहार का मुख्यमंत्री भूमिहारों से भूमि छीन लेना चाहती है। इसलिये अब राज्य में एक नये प्रकार के संघर्ष की आवश्यकता है।

बहरहाल रणवीर सेना के इस नये कोशिश को बड़ी संख्या में लोग देख रहे हैं। इसके अलावा जिस तरीके इस कोशिश को अंजाम दिया जा रहा है, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सत्ता परिवर्तन के बाद बिहार में रणवीर सेना बिहार में एक बार आगाज कर सकता है।





बुधवार, 18 अगस्त 2010

रणवीर सेना

रणवीर सेना, भारत का  उग्रवादी संगठन हैं, किसका मुख्य  क्षेत्र बिहार है | यह अन्य सन्गठनो से भिन्न है, क्योकि यह मुख्यतः जाति आधारित सन्गठन है। और इसका मुख्य उद्देश्य बडे जमीन्दारो की जमीनो की रक्षा करना है।

रणवीर सेना की स्थापना 1995 में मध्य बिहार के भोजपुर जिले के गांव बेलाऊर में हुई.दरअसल जिले के किसान भाकपा माले (लिबरेशन ) नामक नक्सली संगठन के अत्याचारों से परेशान थे और किसी विकल्प की तलाश में थे. ऐसे किसानों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल पर छोटी-छोटी बैठकों के जरिये संगठन की रूपरेखा तैयार की.बेलाऊर के मध्य विद्यालय प्रांगण में एक बड़ी किसान रैली कर रणवीर किसान महसंघ के गठन का ऐलान किया गया.तब खोपिरा के पूर्व मुखिया बरमेश्वर सिंह,बरतियर के कांग्रेसी नेता जनार्दन राय,एकवारी के भोला सिंह,तीर्थकौल के प्रोफेसर देवेन्द्र सिंह,भटौली के युगेश्वर सिंह,बेलाउर के वकील चौधरी ,धनछूहां के कांग्रेसी नेता डॉ.कमलाकांत शर्मा और खण्डौल के मुखिया अवधेश कुमार सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई.इन लोगों ने गांव -गांव जाकर किसानों को माले के अत्याचारों के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया.आरंभ में इनके साथ लाईसेंसी हथियार वाले लोग हीं जुटे. फिर अवैध हथियारों का जखीरा भी जमा होने लगा.भोजपुर में वैसे किसान आगे थे जो नक्सली की आर्थिक नाकेबंदी झेल रहे थे.जिस समय रणवीर किसान संघ बना उस वक्त भोजपुर के कई गांवो में भाकपा माले लिबरेशन ने मध्यम और लघु किसानों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी लगा रखा था. करीब पांच हजार एकड़ जमीन परती पड़ी थी. खेती बारी पर रोक लगा दी गयी थी और मजदूरों को खेतों में काम करने से जबरन रोक दिया जाता था. कई गांवों में फसलें जलायी जा रही थीं और किसानों को शादी-व्याह जैसे समारोह आयोजित करने में दिक्कतें आ रही थी. इन परिस्थितियों ने किसानों को एकजुट होकर प्रतिकार करने के लिए माहौल तैयार किया. रणवीर सेना के गठन की ये जमीनी हकीकत है. भोजपुर में संगठन बनने के बाद पहला नरसंहार हुआ सरथुआं गांव में ,जहां एक साथ पांच मुसहर जाति के लोगों की हत्या कर दी गयी.बाद में तो नरसंहारों का सिलसिला हीं चल पड़ा.बिहार सरकार ने सवर्णो की इस सेना को तत्काल प्रतिबंधित कर दिया.लेकिन हिंसक गतिविधियां जारी रही. प्रतिबंध के बाद रणवीर संग्राम समिति के नाम से इसका हथियारबंद दस्ता विचरण करने लगा. दरअसल भाकपा माले हीं इस संगठन को रणवीर सेना का नाम दे दिया. और इसे सवर्ण सामंतों की बर्बर सेना कहा जाने लगा. एक तरफ भाकपा माले का दस्ता खून बहाता रहा तो प्रतिशोध में रणवीर सेना के हत्यारे खून की होली खेलते रहे.करीब पांच साल तक चली हिंसा-प्रतिहिंसा की लड़ाई के बाद घीरे-घीरे शांति लौटी.लेकिन इस बीच मध्य बिहार के जहानाबाद,अरवल,गया , औरंगाबाद ,रोहतास ,बक्सर और कैमूर जिलों में रणवीर सेना ने प्रभाव बढ़ा लिया. बाद के दिनों में राष्ट्रवादी किसान महासंघ नामक संगठन का निर्माण किया गया. महासंघ ने आरा के रमना मैदान में कई रैलियां की और कुछ गांवों में भी बड़े-बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम हुए. जगदीशपुर के इचरी निवासी राजपूत जाति के किसान रंग बहादुर सिंह को इसका पहला अध्यक्ष बनाया गया.आरा लोकसभा सीट से रंगबहादुर सिंह ने चुनाव भी लड़ा और एक लाख के आसपास वोट पाया. रणवीर सेना के संस्थापक सुप्रीमो बरमेश्वर सिंह उर्फ मुखियाजी पटना में नाटकीय तरीके से पकड़ लिये गये.फिलहाल वे आरा जेल में हैं.जेल में रहते हुए उन्होंने भी लोकसभा का चुनाव लड़ा और डेड़ लाख वोट लाकर अपनी ताकत का एहसास कराया.आज की तारीख में रणवीर सेना की गतिविधियां बंद सी हो गयी हैं.इसके कई कैडर या को मारे गये या जेलों में बंद हैं.

रणवीर सेना

रणवीर सेना भोजपुर के भूमिहार जमींदारों द्वारा 1994 में नक्सलियों की सक्रियता बद करने के लिए एक प्रतिक्रिया के रूप में बनाई थी. अनेक सेनाओं ने80-90 के दशक मे सुत्रपात किया उनमे सवर्ण लिबरेशन आर्मी, ब्रह्म्रिशि सेना, शिवसेना , गंगा शिवसेना प्रमुख थे .पर केवल रणवीर सेना ही अपना असतित्वा बचा सकी।अर्थात भुमिहारो ने ही जमिदरी से जुडी परंपरा को परिष्कृत किया गया। नक्सलवादी विचारधारा के खिला एक सशस्त्र प्रतिक्रिया चुनौती इसका रुप था.
रणवीर सेना आत्म रक्षा के लिए हथियार और पुरुषों की भीड़ मात्र है। वे भी बिहार में मौजूदा राजनीतिक पर लड़ाई मे बलि के बकरे बनते रहे है.आखिर है तो वे सभी सज्जन किसानों, जो खुद का अस्तित्व बचाने के लिये कानून को अपने हाथ मे लेने को मजबुर थे।शायद भविष्य मे बिहार का सुशासन इन्हे स्वयं ही खुद को इतिहास बनाने पर मजबुर कर दे।