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शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

आन्दोलन बिहार और हम

१ अप्रैल, १९३३ को मोहम्मद युनुस ने अपने नेतृत्व में प्रथम भारतीय मन्त्रिमण्डल बिहार में स्थापित किया गया । इसके सदस्य बहाव अली, कुमार अजिट प्रताप सिंह और गुरु सहाय लाल थे । युनुस मन्त्रिमण्डल के गठन के दिन जयप्रकाश नारायण, बसावन सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी ने इसके विरुद्ध प्रदर्शन किया । फलतः गवर्नर ने वैधानिक कार्यों में गवर्नर हस्तक्षेप नहीं करेगी का आश्‍वासन दिया ।

७ जुलाई, १८३७ को कांग्रेस कार्यकारिणी ने सरकारों के गठन का फैसला लिया । मोहम्मद यूनुस के अन्तरिम सरकार के त्यागपत्र के बाद २० जुलाई, १९३७ को श्रीकृष्ण सिंह ने अपने मन्त्रिमण्डल का संगठन किया लेकिन
१५ जनवरी, १९३८ में राजनीतिक कैदियों की रिहाई के मुद्दे पर अपने मन्त्रिमण्डल को भंग कर दिया ।

१९ मार्च, १९३८ को द्वितीय विश्‍व युद्ध में बिना ऐलान के भारतीयों को शामिल किया गया, जिसका पूरे देश भर में इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुआ । २७ जून, १९३७ में लिनलियथगो ने आश्‍वासन दिया कि भारतीय मन्त्रियों के वैधानिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा ।

आजाद दस्ता- यह भारत छोड़ो आन्दोलन के बाद क्रान्तिकारियों द्वारा प्रथम गुप्त गतिविधियाँ थीं । जयप्रकाश नारायण ने इसकी स्थापना नेपाल की तराई के जंगलों में रहकर की थी । इसके सदस्यों को छापामार युद्ध एवं विदेशी शासन को अस्त-व्यस्त एवं पंगु करने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा ।

बिहार प्रान्तीय आजाद दस्ते का नेतृत्व सूरज नारायण सिंह के अधीन था । परन्तु भारत सरकार के दबाव में मई, १९४३ में जय प्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया, रामवृक्ष बेनीपुरी, बाबू श्यामनन्दन, कार्तिक प्रसाद सिंह इत्यादि नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और हनुमान नगर जेल में डाल दिया गया । आजाद दस्ता के निर्देशक सरदार नित्यानन्द सिंह थे । मार्च, १९४३ में राजविलास (नेपाल) में प्रथम गुरिल्ला प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई ।

सियाराम दल- बिहार में गुप्त क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व सियाराम दल ने स्थापित किया था । इसके क्रान्तिकारी दल के कार्यक्रम की चार बातें मुख्य थीं- धन संचय, शस्त्र संचय, शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण तथा सरकार का प्रतिरोध करने के लिए जनसंगठन बनाना । सियाराम दल का प्रभाव भागलपुर, मुंगेर, किशनगंज, बलिया, सुल्तानगंज, पूर्णिया आदि जिलों में था । क्रान्तिकारी आन्दोलन में हिंसा और पुलिस दमन के अनगिनत उदाहरण मिलते हैं ।

११ अगस्त, १९४२ को सचिवालय गोलीकाण्ड बिहार के इतिहास वरन्‌ भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का एक अविस्मरणीय दिन था । पटना के जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्थर के आदेश पर पुलिस ने गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया । पुलिस ने १३ या १४ राउण्ड गोलियाँ चलाईं, इस गोलीकाण्ड में सात छात्र शहीद हुए, लगभग २५ गम्भीर रूप से घायल हुए । ११ अगस्त, १९४२ के सचिवालय गोलीकाण्ड ने बिहार में आन्दोलन को उग्र कर दिया ।


सचिवालय गोलीकाण्ड में शहीद सात महान बिहारी सपूत-

१. उमाकान्त प्रसाद सिंह- राम मोहन राय सेमीनरी स्कूल के १२वीं कक्षा का छात्र था । इसके पिता राजकुमार सिंह थे । वह सारण जिले के नरेन्द्रपुर ग्राम का निवासी था ।

२. रामानन्द सिंह- ये राम मोहन राय सेमीनरी स्कूल पटना के ११ वीं कक्षा का छात्र था । इनका जन्म पटना जिले के ग्राम शहादत नगर में हुआ था । इनके पिता लक्ष्मण सिंह थे ।

३. सतीश प्रसाद झा- सतीश प्रसाद का जन्म भागलपुर जिले के खडहरा में हुआ था । इनके पिता जगदीश प्रसाद झा थे । वह पटना कालेजियत स्कूल का ११वीं कक्षा का छात्र था । सीवान थाना में फुलेना प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा राष्ट्रीय झण्डा लहराने की कोशिश में पुलिस गोली का शिकार हुए ।

४. जगपति कुमार- इस महान सपूत का जन्म गया जिले के खराठी गाँव में हुआ था ।

५. देवीपद चौधरी- इस महान सपूत का जन्म सिलहर जिले के अन्तर्गत जमालपुर गाँव में हुआ था । वे मीलर हाईस्कूल के ९वीं कक्षा का छात्र था ।

६. राजेन्द्र सिंह- इस महान सपूत का जन्म सारण जिले के बनवारी चक ग्राम में हुआ था । वह पटना हाईस्कूल के ११वीं का छात्र था ।

७. राय गोविन्द सिंह- इस महान सपूत का जन्म पटना जिले के दशरथ ग्राम में हुआ । वह पुनपुन हाईस्कूल का ११वीं का छात्र था ।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद इस स्थान पर शहीद स्मारक का निर्माण हुआ । इसका शिलान्यास स्वतन्त्रता दिवस को बिहार के प्रथम राज्यपाल जयराम दौलत राय के हाथों हुआ । औपचारिक अनावरण देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने १९५६ ई. में किया । भारत छोड़ो आन्दोलन के क्रम में बिहार में १५,००० से अधिक व्यक्‍ति बन्दी बनाये गये, ८,७८३ को सजा मिली एवं १३४ व्यक्‍ति मारे गये ।

बिहार में भारत छोड़ो आन्दोलन को सरकार द्वारा बलपूर्वक दबाने का प्रयास किया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि क्रान्तिकारियों को गुप्त रूप से आन्दोलन चलाने पर बाध्य होना पड़ा ।

९ नवम्बर, १९४२ दीवाली की रात में जयप्रकाश नारायण, रामनन्दन मिश्र, योगेन्द्र शुक्ला, सूरज नारायण सिंह इत्यादि व्यक्‍ति हजारीबाग जेल की दीवार फाँदकर भाग गये । सभी शैक्षिक संस्थान हड़ताल पर चली गई और राष्ट्रीय झण्डे लहराये गये । ११ अगस्त को विद्यार्थियों के एक जुलूस ने सचिवालय भवन के सामने विधायिका की इमारत पर राष्ट्रीय झण्डा लहराने की कोशिश की ।

द्वितीय विश्‍व युद्ध की प्रगति और उससे उत्पन्‍न गम्भीर परिस्थित्यों को देखते हुए कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार को सहायता व सहयोग दिया । अगस्त प्रस्ताव और क्रिप्स प्रस्ताव में दोष होने के कारण कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया था ।

दिसम्बर, १९४१ में जापानी आक्रमण से अंग्रेज भयभीत हो गये थे । मार्च, १९४२ में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री विन्सटन चर्चिल ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान किया जायेगा । २२ मार्च, १९४२ को स्टेफोर्ड किप्स ने इस व्यवस्था में लाया । फलतः उनके प्रस्ताव राष्ट्रवादियों के लिए असन्तोषजनक सिद्ध हुए । ३० जनवरी, १९४२ से १५ फरवरी, १९४२ तक पटना में रहकर मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने सार्वजनिक सभा को सम्बोधित किया ।

१४ जुलाई, १९४२ को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का आयोजन किया गया । इसी समय सुप्रसिद्ध भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और उसे अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति को मुम्बई में होने वाली बैठक में प्रस्तुत करने का निर्णय हुआ । ५ अगस्त, १९४२ को मुम्बई में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और गाँधी जी ने करो या मरो का नारा दिया साथ ही कहा हम देश को चितरंजन दास की बेड़ियों में बँधे हुए देखने को जिन्दा नहीं रहेंगे । ८ अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के तुरन्त बाद कांग्रेस के अधिकतर नेता गिरफ्तार कर लिये गये । डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया । इसके बाद में मथुरा बाबू, श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह बाबू इत्यादि भी गिरफ्तार कर लिए गये । बलदेव सहाय ने सरकारी नीति के विरोध में महाधिवक्‍ता पद से इस्तीफा दे दिया । ९ अगस्त अध्यादेश द्वारा कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया । इसके फलस्वरूप गवर्नर ने इण्डिपेंडेन्ट पार्टी के सदस्य मोहम्मद युनुस को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रण किया । मोहम्मद युनुस बिहार के भारतीय प्रधानमन्त्री बने ।

(तत्कालीन समय में प्रान्त के प्रधान को प्रधानमन्त्री कहा जाता था।)

भारत सरकार अधिनियम, १९३५ एवं बिहार में प्रथम कांग्रेस का मन्त्रिमण्डल

ब्रिटिश संसद द्वारा १९३५ ई. में भारत के शासन के लिए एक शासन विधान को पारित किया गया । १९३५ ई. से १९४७ ई. तक इसी आधार पर भारतीय शासन होता रहा । इस विधान में एक संघीय शासन की व्यवस्था थी । कांग्रेस ने इसे अपेक्षाओं से कम माना लेकिन चुनाव में भाग लिया । १९३५-३६ ई. के चुनाव तैयार करने लगा । जवाहरलाल नेहरू एवं गोविन्द वल्लभ पन्त ने बिहार का दौरा कर कांग्रेसियों का जोश बढ़ाया ।

कांग्रेस ने अनेक रचनात्मक कार्य उद्योग संघ, चर्खा संघ आदि चलाये । रात्रि समय में पाठशाला, ग्राम पुसतकालय खोले गये । आटा चक्‍की, दुकान चलाना एवं खजूर से गुड़ बनाना आदि कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया । बिहार में कांग्रेसी आश्रम खोलने का शीलभद्र याज्ञी का विशेष योगदान रहा । १९३५ ई. का वर्ष कांग्रेस का स्वर्ण जयन्ती वर्ष था जो डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की अध्यक्षता में धूमधाम से मनाया गया । जनवरी १९३६ ई. में छः वर्षों के प्रतिबन्धों के पश्‍चात्‌ बिहार राजनीतिक सम्मेलन का १९वाँ अधिवेशन पटना में आयोजित किया गया । २२ से २७ जनवरी के मध्य बिहार के १५२ निर्वाचन मण्डल क्षेत्रों में चुनाव सम्पन्‍न हुए । कांग्रेस ने १०७ में से ९८ जीते । १७-१८ मार्च को दिल्ली में कांग्रेस बैठक के बाद बिहार में कांग्रेस मन्त्रिमण्डल का गठन हुआ ।

२१ जून को वायसराय लिनलिथगो के वक्‍तव्य ने संशयों को दूर करने में सफलता पाई अन्त में युनुस को सरकार का निमन्त्रण न देकर श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व मन्त्रिमण्डल का गठन किया गया,अनुग्रह नारायण सिंह उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री बने । रामदयालु अध्यक्ष तथा प्रो. अब्दुल बारी विधानसभा के उपाध्यक्ष बने । इस बीच अण्डमान से लाये गये राजनीतिक कैदियों की रिहाई के प्रश्‍न पर गंभीर विवाद उत्पन्‍न हो गया फलतः वायसराय के समर्थन इन्कार के बाद १५ जनवरी, १९३८ के मन्त्रिमण्डल ने इस्तीफा दे दिया । कांग्रेस ने बाद में सुधारात्मक एवं रचनात्मक कार्यों की तरफ ध्यान देने लगा । बिहार टेनेन्सी अमेण्टमेड एक्ट के तहत काश्तकारी व्यवस्था के अन्तर्गत किसानों को होने वाली समस्या को दूर करने का प्रयास किया । चम्पारण कृषि संशोधन कानून और छोटा नागपुर संशोधन कानून पारित किये गये । श्रमिकों में फैले असन्तोष से १९३७-३८ ई. में ग्यारह बार हड़तालें हुईं । अब्दुल बारी ने टाटा वर्क्स यूनियन की स्थापना की । योगेन्द्र शुक्ल, सत्यनारायण सिंह आदि प्रमुख श्रमिक नेता हुए । इस बीच मुस्लिम लीग की गतिविधियाँ बढ़ गयीं ।
विदेशी वस्त्र बहिष्कार- ३ जनवरी, १९२९ को कलकत्ता में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार करने का निर्णय किया गया । इसमें अपने स्वदेशी वस्त्र खादी वस्त्र को बढ़ावा देने के लिए माँग की गई । सार्वजनिक सभाओं एवं मैजिक लालटेन की सहायता से कार्यकर्ता के सहारे गाँव में पहुँचे ।

पूर्ण स्वाधीनता प्रस्ताव- जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का २९-३१ दिसम्बर, १९२९ का लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता प्रस्ताव स्वीकृत किया गया । बिहार कांग्रेस कार्यसमिति की २० जनवरी, १९३० को पटना में एक बैठक आयोजित की गई । २६ जनवरी, १९३० को सभी जगह स्वतन्त्रता दिवस मनाने को निश्‍चित किया और मनाया गया ।

नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन

दिसम्बर १९२९ ई. में पण्डित जवाहरलाल की अध्यक्षता में लाहौर का अधिवेशन सम्पन्‍न हुआ था । इसके साथ ही गाँधी जी ने फरवरी १९३० ई. में कार्यकारिणी कांग्रेस को गाँधी जी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन करने का अधिकार दिया ।

१२ मार्च, १९३० को महात्मा गाँधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आरम्भ नमक कानून तोड़ने के साथ शुरू हुआ । २६ जनवरी, १९३० को बिहार में स्वाधीनता मनाने के उपरान्त १२ मार्च को गाँधी जी की डांडी यात्रा शुरू हुई थी । बिहार में नमक सत्याग्रह का प्रारम्भ १५ अप्रैल, १९३० चम्पारण एवं सारण जिलों में नमकीन मिट्टी से नमक बनाकर किया गया । पटना में १६ अप्रैल, १९३० को नरवासपिण्ड नामक स्थान दरभंगा में सत्यनारायण सिंह, मुंगेर में श्रीकृष्ण सिंह ने नमक कानून को तोड़ा ।

४ मई, १९३० को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया । इसके विरोध में पूरे बिहार में विरोध प्रदर्शन किया गया । मई, १९३० ई. में बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने विदेशी वस्त्रों और शराब की दुकानों के आगे धरने का प्रस्ताव किया । इसी आन्दोलन के क्रम में बिहार में चौकीदारी कर देना बन्द कर दिया गया । स्वदेशी वस्त्रों की माँग पर छपरा जिले में कैदियों ने नंगा रहने का निर्णय किया । इसे नंगी हड़ताल के नाम से जाना जाता है । ७ अप्रैल को गाँधी जी ने अपने वक्‍तव्य द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित करने की सलाह दी । १८ मई, १९३४ को बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने आन्दोलन को स्थगित कर दिया ।

साइमन कमीशन वापस जाओ आन्दोलन

१९२७ ई. में ब्रिटिश संसद एवं भारतीय वायसराय लॉर्ड डरविन ने एक घोषणा की भारत में फैल रही नैराश्य स्थिति की समाप्ति हेतु १९२८ ई. में एक कमीशन की स्थापना की घोषणा की । इस कमीशन के अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे, अतः इसे साइमन कमीशन कहा जाता है किन्तु इसमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं रखा गया था । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस आयोग के बहिष्कार एवं विरोध का फैसला किया । बिहार प्रदेश कांग्रेस कार्यसमिति की पटना में सर अली इमाम की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें साइमन कमीशन के पटना आगमन पर पूर्ण बहिष्कार किया गया ।
१८ दिसम्बर, १९२८ को साइमन कमीशन बिहार आया । हार्डिंग पार्क (पटना) के सामने बने विशेष प्लेटफार्म के सामने ३०,००० राष्ट्रवादियों ने साइमन वापस जाओ के नारे से स्वागत किया गया । साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लखनऊ में पण्डित जवाहर लाल एवं लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठियाँ बरसाई गईं । लाठी की चोट से लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई । फलतः विद्रोह पूरे देश में फैल गया । कमीशन के विरोध में बिहार में राजेन्द्र प्रसाद ने इसकी अध्यक्षता की थी । बिहार राष्ट्रवादियों ने नारा दिया कि “जवानों सवेरा हुआ साइमन भगाने का बेरा हुआ” । विरोधी नेताओं में ब्रज किशोर जी, रामदयालु जी एवं अनुग्रह नारायण बाबू थे । इस घटना ने बिहार के लिए नई चेतना पैदा कर दी । १९२९ ई. में सर्वदलीय सम्मेलन हुआ जिसमें भारत के लिए संविधान बनाने के लिए मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनी जिसे नेहरू रिपोर्ट कहते हैं । पटना में दानापुर रोड बना राष्ट्रीय पाठशाला (अन्य) भी खुली । एक मियाँ खैरूद्दीन के मकान के छात्रों को पढ़ाना शुरू किया गया । बाद में यही जगह सदाकत आश्रम के रूप में बदल गया ।

नवम्बर १९२१ ई. ब्रिटिश युवराज का भारत आगमन हुआ । इनके आगमन के विरोध करने का फैसला किया गया । इसके लिए बिहार प्रान्तीय सम्मेलन का आयोजन किया गया । जब राजकुमार २२ दिसम्बर, १९२१ को पटना आये तो पूरे शहर में हड़ताल थी । ५ जनवरी, १९२२ को उत्तर प्रदेश के चौरा-चौरी नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने २१ सिपाहियों को जिन्दा जला दिया तो गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने का निर्णय
लिया । गाँधी जी को १० मार्च, १९२२ को गिरफ्तार कर ६ महीना के लिए जेल भेज दिया गया ।

बिहार में स्वराज पार्टी

चौरा-चौरी काण्ड से दुःखी होकर गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन को समाप्त कर दिया फलतः देशबन्धु चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू और विट्‍ठलभाई पटेल ने एक स्वराज दल का गठन किया ।
बिहार में स्वराज दल का गठन फरवरी १९२३ ई. में हुआ । नारायण प्रसाद अध्यक्ष, अब्दुल बारी सचिव एवं कृष्ण सहाय तथा हरनन्दन सहाय को सहायक सचिव बनाया गया । मई, १९२३ ई. को नई कार्यकारिणी का गठन हुआ । २ जून, १९२३ को पटना में स्वराज दल की एक बैठक हुई जिसमें पटना, तिरहुत, छोटा नागपुर एवं भागलपुर मण्डलों में भी स्वराज दल की शाखाओं को गठित करने की घोषणा की गई, लेकिन यह आन्दोलन ज्यादा दिनों तक नहीं चला ।

असहयोग आन्दोलन

इस आन्दोलन का प्रारूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सितम्बर, १९२० ई. में पारित हुआ, लेकिन बिहार में इसके पूर्व ही असहयोग प्रस्ताव पारित हो चुका था । २९ अगस्त, १९१८ को कांग्रेस ने अपने मुम्बई अधिवेशन में ंआण्टेक्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट पर विचार किया जिसकी अध्यक्षता बिहार के प्रसिद्ध बैरिस्टर हसन इमान ने की । हसन इमान के नेतृत्व में इंग्लैण्ड में एक शिष्ट मण्डल भेजा जा रहा था, जिससे ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया जाय । रौलेट एक्ट के काले कानून के विरुद्ध गाँधी जी ने पूरे देश में जनआन्दोलन छेड़ रखा था ।

बिहार में ६ अप्रैल, १९१९ को हड़ताल हुई । मुजफ्फरपुर, छपरा, गया, मुंगेर आदि स्थानों पर हड़ताल का व्यापक असर पड़ा । ११ अप्रैल, १९१९ को पटना में एक जनसभा का आयोजन किया गया जिसमें गाँधी जी की गिरफ्तारी का विरोध किया गया । असहयोग आन्दोलन के क्रम में मजरूलहक, राजेन्द्र प्रसाद,अनुग्रह नारायण सिंह, ब्रजकिशोर प्रसाद, मोहम्मद शफी और अन्य नेताओं ने विधायिका के चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली । छात्रों को वैकल्पिक शिक्षा प्रदान करने के लिए पटना-गया रोड पर एक राष्ट्रीय महाविद्यालय के ही प्रांगण में बिहार विद्यापीठ का उद्‍घाटन ६ फरवरी, १९२१ को गाँधी जी द्वारा किया गया । २० सितम्बर, १९२१ से मजहरूल हक ने सदाकत आश्रय से ही मदरलैण्ड नामक अखबार निकालना शुरू किया । इसका प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय भावना के प्रचार-प्रसार एवं हिन्दू-मुस्लिम एकता की स्थापना करना था । इन्होंने गाँधी जी को किसानों की आर्थिक दशा की तरफ ध्यान दिलाया । ब्रजकिशोर प्रसाद ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिससे समस्याओं का निदान किया जा सके । राजकुमार शुक्ल के अनुरोध पर गाँधी जी ने कलकत्ता से १५ अप्रैल, १९१७ को पटना, मुजफ्फरपुर तथा दरभंगा होते हुए चम्पारण पहुँचे । स्थानीय प्रशासन ने उनके आगमन एवं आचरण को गैर-कानूनी घोषित कर गिरफ्तार कर लिया और मोतिहारी की जेल में भेज दिया गया लेकिन अगले दिन छोड़ दिया गया । बाद में तत्कालीन उपराज्यपाल एडवर्ड गेट ने गाँधीजी को वार्ता के लिए बुलाया और किसानों के कष्टों की जाँच के लिए एक समिति के लिए एक कमेटी का गठन किया, जिसका नाम चम्पारण एग्रेरोरियन कमेटी पड़ा । गाँधी जी के कहने पर तीन कढ़िया व्यवस्था का अन्त कर दिया गया ।

खिलाफत आन्दोलन

प्रथम विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद जब विजयी राष्ट्रों ने तुर्की सुल्तान के खलीफा पद को समाप्त कर दिया तो अंग्रेजों द्वारा कोई आश्‍वासन न मिलने के कारण भारतीय मुसलमानों एवं राष्ट्रवादियों का गुस्सा भड़क उठा । फलतः मौलाना मोहम्मद अली एवं शौकत अली ने खिलाफत आन्दोलन शुरू किया । यह आन्दोलन १९१९-२३ ई. में हुआ ।
१६ जनवरी, १९१९ को पटना में हसन इमाम की अध्यक्षता में एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें खलीफा के प्रति मित्र राष्ट्रों द्वारा उचित व्यवहार करने को कहा गया । अप्रैल, १९१९ ई. में पटना में शौकत अली आये और १९२० ई. तक पूरे बिहार में यह आन्दोलन फैल गया । इसके लिए उन्होंने मोतीहारी, छपरा, पटना, फुलवारी शरीफ में जनसभाओं को सम्बोधित किया ।
१९२२ ई. में यह आन्दोलन पूर्णरूपेण समाप्त हो गया । शचिन्द्रनाथ सान्याल ने १९१३ ई. में पटना में अनुशीलन समिति की शाखा की नींव रखी । ढाका अनुशीलन समिति के सदस्य रेवती नाग ने भागलपुर में और यदुनाथ सरकार ने बक्सर में युवा क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षित किया ।

होमरूल आन्दोलन

१९१६ ई. में भारत में होमरूल आन्दोलन प्रारम्भ हुआ था । श्रीमती एनी बेसेन्ट ने मद्रास में एवं बाल गंगाधर तिलक ने पूना में इसकी स्थापना की थी ।
बिहार में होमरूल लीग की स्थापना १६ दिसम्बर, १९१६ में हुई, इसके अध्यक्ष मौलाना मजहरूल हक, उपाध्यक्ष सरफराज हुसैन खान और पूर्गेन्दू नारायण सिंह तथा मन्त्री चन्द्रवंशी सहाय और वैद्यनाथ नारायण नियुक्‍त किये गये । एनी बेसेन्ट भी होमरूल के आन्दोलन के सम्बन्ध में दो-तीन बार पटना भी आयीं । इनका भव्य स्वागत किया गया । वर्तमान पटना कॉलेज के सामने के सड़क का नाम एनी बेसेन्ट रोड इन्हीं के नाम पर रखा गया है ।

चम्पारण सत्याग्रह आन्दोलन

बिहार का चम्पारण जिला १९१७ ई. में महात्मा गाँधी द्वारा भारत में सत्याग्रह के प्रयोग का पहला स्थल था
चम्पारण में अंग्रेज भूमिपतियों द्वारा किसानों पर निर्मम शोषण किया जा रहा था । जमींदारों द्वारा किसानों को बलात नील की खेती के लिए बाध्य किया जाता था । प्रत्येक बीघे पर उन्हें तीन कट्ठों में नील की खेती अनिवार्यतः करनी पड़ती थी । इन्हें तीन कठिया व्यवस्था कहा जाता था । बदले में उचित मजदूरी नहीं दी जाती थी । इसी कारण से किसानों एवं मजदूरों में भयंकर आक्रोश था । सन्‌ १९१६ में लखनऊ अधिवेशन में चम्पारण के राजकुमार शुक्ल जो स्वयं जमींदार के आर्थिक शोषण से ग्रस्त थे, भाग लिया ।
२६ दिसम्बर, १९३८ को पटना में मुस्लिम लीग का २६वाँ अधिवेशन हुआ । २९ दिसम्बर, १९३८ को अखिल भारतीय मुसलमान छात्र सम्मेलन हुआ । ४ जनवरी, १९३२ को राजेन्द्र प्रसाद,अनुग्रह नारायण सिंह, ब्रजकिशोर प्रसाद, कृष्ण बल्लभ सहाय आदि नेतागण को गिरफ्तार किया गया । रैम्जे मैक्डोनाल्ड द्वारा हरिजन को कोटा की व्यवस्था से अस्त-व्यस्त हो गया । १२ जुलाई, १९३३ को सामुदायिक सविनय अवज्ञा के स्थान पर व्यक्‍तिगत सविनय अवज्ञा का प्रारूप तैयार किया गया । १९२७ ई. में पटना युवा संघ की स्थापना की गई ।

नंगी हड़ताल- ४ मई, १९३० को गाँधी जी की गिरफ्तारी के बाद स्वदेशी के प्रचार एवं विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार
किया गया । छपरा के कैदियों ने वस्त्र पहनने से इंकार कर दिया । नंगे शरीर रहकर विदेशी वस्त्रों का विरोध किया गया ।

बेगूसराय गोलीकाण्ड एवं बिहार किसान आन्दोलन

२६ जनवरी, १९३१ को प्रथम स्वाधीनता दिवस को पूरे जोश से मनाने का निर्णय किया गया । रघुनाथ ब्रह्मचारी के नेतृत्व में बेगूसराय जिले के परहास से एक जुलूस निकाला गया । डीएसपी वशीर अहमद ने गोली चलाने का आदेश दे दिया । छः व्यक्‍ति की घटना स्थल पर मृत्यु हो गई । टेदीनाथ मन्दिर के सामने गोलीकाण्ड हुआ था ।

१९१९ ई. में मधुबनी जिले के किसान स्वामी विद्यानन्द ने दरभंगा राज के विरुद्ध विरोध किया । १९२२-३३ ई. में मुंगेर में बिहार किसान सभा का गठन मोहम्मद जूबैर और श्रीकृष्ण सिंह द्वारा किया । १९२८ ई. में स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने प्रान्तीय किसान सभा की स्थापना की । इसकी स्थापना में कार्यानन्द शर्मा, राहुल सांकृत्यायन, पंचानन शर्मा, यदुनन्दन शर्मा आदि वामपंथी नेताओं का सहयोग मिला ।

स्वामी दयानन्द सहजानन्द ने ४ मार्च, १९२८ को किसान आन्दोलन प्रारम्भ किया । इसी वर्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल की बिहार यात्रा हुई और अपने भाषणों से किसानों को नई चेतना से जागृत किया । बाद में इस आन्दोलन को यूनाइटेड पोलीटीकल पार्टी का नाम दिया गया ।

१९३३ ई. में किसान सभा द्वारा जाँच कमेटी का गठन किया गया । कमेटी द्वारा किसानों की दयनीय दशा के प्रति केन्द्रीय कर लगाया गया । १९३६ ई. में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ था । इसके अध्यक्ष स्वामी सहजानन्द स्वामी थे और महासचिव प्रोफेसर एन. जे. रंगा थे ।

बिहार में मजदूर आन्दोलन

बिहार में किसानों के समान मजदूरी का भी संगठन बना । बिहार में औद्योगिक मजदूर वर्ग ने मजदूर आन्दोलन चलाया । १९१७ ई. में बोल्शेविक क्रान्ति एवं साम्यवादी विचारों में परिवर्तन के साथ-साथ प्रचार-प्रसार हुआ । दिसम्बर, १९१९ ई. में प्रथम बार जमालपुर (मुंगेर) में मजदूरों की हड़ताल प्रारम्भ हुई । १९२० ई. में एस. एन. हैदर एवं व्यायकेश चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में जमशेदपुर वर्क्स एसोसिएशन बनाया गया । १९२५ ई. और १९२८ ई. के बीच मजदूर संगठन की स्थापना हुई । सुभाषचन्द्र बोस, अब्दुल बारी, जयप्रकाश नारायण इसके प्रमुख नेता थे ।

बिहार में संवैधानिक प्रगति और द्वैध शासन प्रणाली

बिहार प्रान्त का गठन १ अप्रैल, १९१२ में हुआ । इसके गठन के बाद १९१९ ई. को भारत सरकार का कानून लागू किया गया । द्वैध शासन की व्यवस्था बिहार में भी २० दिसम्बर, १९२० को प्रारम्भ हुई जिसकी अध्यक्षता आर. एन. मुधोलकर ने की । मौलाना मजरूलहक स्वागत समिति के अध्यक्ष बनाये गये । १९१६ ई. में पटना उच्च न्यायालय और १९१७ ई. में पटना विश्‍वविद्यालय की स्थापना की गई । २० जनवरी, १९१३ को बिहार, उड़ीसा के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर के नवगठित काउन्सिल की प्रथम बैठक बांकीपुर में हुई, जिसकी अध्यक्षता बिहार-उड़ीसा के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर चार्ल्स स्टुअर्ट बेली ने की ।

७ फरवरी, १९२१ को बिहार एवं उड़ीसा लेजिस्लेटिव काउन्सिल की प्रथम बैठक का उद्‍घाटन हुआ जिसकी अध्यक्षता सर मुण्डी ने की ।

१ अप्रैल, १९३६ को बिहार से उड़ीसा प्रान्त अलग किया गया । पुराने गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, १९१९ के एक सदनी विधानमण्डल की जगह नया कानून के अनुसार द्वि-सदनी विधानमण्डल स्थापित किया गया ।
बिहार में क्रान्तिकारी आन्दोलन

बंग भंग विरोधी आन्दोलन से बिहार तथा बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन प्रारम्भ हो गया । बिहार के डॉ. ज्ञानेन्द्र नाथ, केदारनाथ बनर्जी एवं बाबा ठाकुर दास प्रमुख थे । बाबा ठाकुर दास ने १९०६-०७ ई. में पटना में रामकृष्ण मिशन सोसायटी की स्थापना की और समाचार-पत्र के द्वारा दी मदरलैण्ड का सम्पादन एवं प्रकाशन शुरू किया । १९०८ ई. में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी नामक दो युवकों ने मुजफ्फरपुर के जिला जज डी. एच. किंग्स फोर्ड की हत्या के प्रयास में मुजफ्फरपुर के नामी वकील की पत्‍नी प्रिग्ल कैनेडी की बेटी की हत्या के कारण ११ अगस्त, १९०८ को फाँसी दी गई । इस घटना के बाद भारत को आजाद कराने की भावना प्रबल हो उठी । खेती नाग, चुनचुन पाण्डेय, बटेश्‍वर पाण्डेय, घोटन सिंह, नालिन बागची आदि इस समय प्रमुख नेता थे ।
१९०८ ई. में ही नवाब सरफराज हुसैन खाँ की अध्यक्षता में बिहार कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ । इसमें सच्चिदानन्द सिंह, मजरूलहक हसन, इमाम दीपनारायण सिंह आदि शामिल थे । कांग्रेस कमेटी के गठन के बाद इसके अध्यक्ष इमाम हुसैन को बनाया गया ।

१९०९ ई. में बिहार कांग्रेस सम्मेलन का दूसरा अधिवेशन भागलपुर में सम्पन्‍न हुआ । इसमें भी बिहार को अलग राज्य की माँग जोरदार ढंग से की गई ।

१९०७ ई. में ही फखरुद्दीन कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्‍त होने वाले प्रथम बिहारी बने तथा स्थायी पारदर्शी के रूप में इमाम हुसैन को नियुक्‍त किया गया । १९१० ई. में मार्लेमिण्टो सुधार के अन्तर्गत प्रथम चुनाव आयोजन में सच्चिदानन्द सिंह ने चार महाराजाओं को हराकर बंगाल विधान परिषद्‌ की ओर से केन्द्रीय विधान परिषद्‌ में विधि सदस्य के रूप में नियुक्‍त हुए । १९११ ई. में दिल्ली दरबार में जार्ज पंचम के आगमन में केन्द्रीय परिषद्‍ के अधिवेशन के दौरान सच्चिदानन्द सिंह, अली इमाम एवं मोहम्मद अली ने पृथक बिहार की माँग की । फलतः इन बिहारी महान सपूतों द्वारा १२ दिसम्बर, १९११ को दिल्ली के शाही दरबार में बिहार और उड़ीसा को मिलाकर एक नया प्रान्त बनाने की घोषणा हुई । इस घोषणा के अनुसार १ अप्रैल, १९१२ को बिहार एवं उड़ीसा नये प्रान्त के रूप में इनकी विधिवत्‌ स्थापना की गई । बिहार के स्वतन्त्र अस्तित्व का मुहर लगने के तत्काल बाद पटना में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का २७वाँ वार्षिक सम्मेलन हुआ । मुगलकालीन समय में बिहार एक अलग सूबा था । मुगल सत्ता समाप्ति के समय बंगाल के नवाबों के अधीन बिहार चला गया । फलतः बिहार की अलग राज्य की माँग सर्वप्रथम मुस्लिम और कायस्थ ने की थी । जब लार्ड कर्जन ने बंगाल को १९०५ ई. में पूर्वी भाग एवं पश्‍चिमी भाग में बाँध दिया था तब बिहार के लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया एवं सच्चिदानन्द सिंह एवं महेश नारायण ने अखबारों में वैकल्पिक विभाजन की रूपरेखा देते हुए लेख लिखे थे जो पार्टीशन ऑफ बंगाल और लेपरेशन ऑफ बिहार १९०६ ई. में प्रकाशित हुए थे ।
इस समय कलकत्ता में राजेन्द्र प्रसाद अध्ययनरत थे वे वहाँ बिहारी क्लब के मन्त्री थे । डॉ. सच्चिदानन्द सिंह,अनुग्रह नारायण सिंह, हमेश नारायण तथा अन्य छात्र नेताओं से विचार-विमर्श के बाद पटना में एक विशाल बिहार छात्र सम्मेलन करवाया । यह सम्मेलन दशहरा की छुट्टी में पहला बिहारी छात्र सम्मेलन पटना कॉलेज के प्रांगण में पटना के प्रमुख शर्फुद्दीन के सभापतित्व में सम्पन्‍न हुआ था । इससे बिहार पृथक्‍करण आन्दोलन पर विशेष बल मिला । १९०६ ई. में बिहार टाइम्स का नाम बदलकर बिहारी कर दिया गया । १९०७ ई. में महेश नारायण का निधन हो गया । सच्चिदानन्द ने ब्रह्मदेव नारायण के सहयोग से पत्रिका का सम्पादन जारी रखा ।

बिहार प्रादेशिक सम्मेलन की स्थापना १२-१३ अप्रैल, १९०६ में पटना में हुई जिसकी अध्यक्षता अली इमाम ने की थी । इसमें बिहार को अलग प्रान्त की माँग के प्रस्ताव को पारित किया गया ।
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं नव बिहार प्रान्त के रूप में गठन
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में बिहार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । १८५७ ई. के विद्रोह का प्रभाव उत्तरी एवं मध्य भारत तक ही सीमित राहा । इस आन्दोलन में मुख्य रूप से शिक्षित एवं मध्यम वर्गों का योगदान रहता
था ।

राष्ट्रीय चेतना की जागृति में बिहार ने अपना योगदान जारी रखा । बिहार और बंगाल राष्ट्रीय चेतना का प्रमुख केन्द्र रहा । सार्वजनिक गठन की १८८० ई. में नींव रखकर भारतीय जनता में राष्ट्रीयता की भावना को जगाया । १८८५ ई. में राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हो चुकी थी । १८८६ ई. में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में बिहार के कई प्रतिनिधियों ने भाग लिया था । दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्‍वर सिंह कांग्रेस को आर्थिक सहायता प्रदान की थी ।
नव राज्य का गठन

रेग्यूलेटिंग एक्ट १७७४ ई. के तहत बिहार के लिए एक प्रान्तीय सभा का गठन किया तथा १८६५ ई. में पटना और गया के जिले अलग-अलग किये गये ।
१८९४ ई. में पटना से प्रकाशित समाचार-पत्र के माध्यम से बिहार पृथक्‍करण आन्दोलन की माँग की गई । इस पत्रिका के सम्पादक महेश नारायण और सच्चिदानन्द थे, जबकि किशोरी लाल तथा कृष्ण सहाय भी शामिल थे ।कुर्था थाना में झण्डा फहराने की कोशिश में श्याम बिहारी लाल मारे गये । कटिहार थाने में झण्डा फहराने में कपिल मुनि भी पुलिस का शिकार हुए ।
ब्रिटिश सरकार आन्दोलन एवं क्रान्तिकारी गतिविधियों से मजबूर होकर अपने शासन प्रणाली के नीति को बदलने लगी ।
इस बीच गाँधी जी ने १० फरवरी, १९४३ को २१ दिन का अनशन करने की घोषणा की । समाचार-पत्र में बिहार हेराल्ड, प्रभाकर योगी ने गाँधी जी की रिहाई की जोरदार माँग की । अक्टूबर, १९४३ के बीच लॉर्ड वेवेल वायसराय बनकर भारत आया । इसी समय २२ जनवरी, १९४४ को गाँधी जी की पत्‍नी श्रीमती कस्तूरबा का देहान्त हो गया । मुस्लिम लीग ने बिहार का साम्प्रदायिक माहौल को बिगाड़ कर विभाजन करो और छोड़ो का नारा दे रहा था । मुस्लिम लीग ने ४ फरवरी, १९४४ को उर्दू दिवस तथा २३ मार्च को पाकिस्तान दिवस भी मनाया गया । ६ मई, १९४४ को गाँधी जी को जेल से रिहा कर दिया । अनुग्रह नारायण सिंह, बाबू श्रीकृष्ण सिंह, ठक्‍कर बापा आदि नेताओं की गृह नजरबन्दी का आदेश निर्गत किये गये ।
जून, १९४५ में सरकार ने राजनैतिक गतिरोध को दूर करते हुए एक बार फिर मार्च, १९४६ ई. में बिहार में चुनाव सम्पन्‍न कराया गया । विधानसभा की १५२ सीटों में कांग्रेस को ९८, मुस्लिम लीग को ३४ तथा मोमीन को ५ सीटें मिलीं । ३० मार्च, १९२६ को श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा अन्तरिम सरकार का गठन का मुस्लिम लीग ने प्रतिक्रियात्मक जवाब दिया । देश भर में दंगा भड़क उठा जिसका प्रभाव छपरा, बांका, जहानाबाद, मुंगेर जिलों में था । ६ नवम्बर, १९४६ को गाँधी जी ने एक पत्र जारी कर काफी दुःख प्रकट किया ।

१९ दिसम्बर, १९४६ को सच्चिदानन्द सिंह की अध्यक्षता में भारतीय संविधान सभा का अधिवेशन शुरू हुआ ।

२० फरवरी, १९४७ में घोषणा की कि ब्रिटिश जून, १९४८ तक भारत छोड़ देगा ।

१४ मार्च, १९४७ को लार्ड माउण्टबेटन भारत के वायसराय बनाये गये । जुलाई, १९४७ को इण्डियन इंडिपेंडेण्ट बिल संसद में प्रस्तुत किया । इस विधान के अनुसार १५ अगस्त, १९४७ से भारत में दि स्वतन्त्र औपनिवेशिक राज्य स्थापित किये जायेंगे । बिहार के प्रथम गवर्नर जयरामदास दौलतराम और मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह बने तथा अनुग्रह नारायण सिंह बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री बने।

२६ जनवरी, १९५० को भारतीय संविधान लागू होने के साथ बिहार भारतीय संघ व्यवस्था के अनुरूप एक राज्य में परिवर्तित हो गया ।

१९४७ ई. के बाद भारत में राज्य पुनर्गठन में बिहार को क श्रेणी का राज्य घोषित किया लेकिन १९५६ ई. में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अन्तर्गत इसे पुनः राज्य के वर्ग । में रखा गया ।


१५ नवम्बर, २००१ को बिहार को विभाजित कर झारखण्ड और बिहार कर दिया गया ।

शनिवार, 4 सितंबर 2010

बिटिश साम्राज्य मे भूमिहारो को मिली उपाधिया

पदवी नाम स्थान
सर महाराजा क्रिष्ण प्रताप शाही गोपलगंज
सर महाराजा योगेन्द्र नरायण राय मुर्शिदावाद
सर महाराजा हरेन्द्र किशोर सिंह बेतिया
सर महाराजा प्रभुनाराय्ण सिंह वाराणसी
सर आदित्य नारायण सिंह वाराणसी
सर डा० गणेश दत्त सिंह बिहार
सर डा० चन्द्रेश्वर सिंह सीतामणी
दिवान बहादुर श्री वद्री नारायण सिंह जैतपुर स्टेट
दिवान बहादुर श्री कामेश्वर सिंह नरहन स्टेट
राय बहादुर श्री मेदिनी सिंह बेगु सराय
राय बहादुर श्री जगदीश सिंह बभनगावा स्टेट
राय बहादुर श्री ऎपल सिंह रानी वीणा स्टेट
राय बहादुर श्री चन्द्रधारी सिंह धरहरा स्टेट
राय बहादुर श्री बच्चू सिंह मोकामा स्टेट
राय बहादुर श्री काशी नाथ सिंह मलहिया स्टेट
राय बहादुर श्री वागेश्वर सिंह गया
राय बहादुर श्री रामेश्वर सिंह गया
राय बहादुर श्री रामनेवाज सिंह मुजफ़फ़र्पुर 
राय बहादुर श्री महेश्वर सिंह समस्तीपुर
राय बहादुर श्री कुवर कविन्द्र नाथ सिंह वराण्सी
राय बहादुर श्री अवध किशोर सिंह बेगु सराय
राय बहादुर श्री दीप नरायण राय गाजीपुर
राय बहादुर श्री जगदेव राय सुहवल
राय बहादुर श्री महावीर सिंह वरावगज
राय बहादुर श्री भगवती सिंह आगापुर स्टेट
राय बहादुर श्री श्याम नरायण सिंह दीशनी
राय बहादुर श्री राम शकर सिंह छ्परा
राय बहादुर श्री राम प्रसाद शाही व्गोरा
राय बहादुर श्री शत्रुध्न शाही पतना
राय बहादुर श्री सिधेश्वर सिंह भागल्पुर
राय साहब श्री भगवत सिंह वैशाली
राय साहब श्री जगत सिंह समस्तीपुर
राय साहब श्री महदेव प्रसाद सिंह


गुरुवार, 19 अगस्त 2010

श्री कृष्ण सिन्हा

  
श्री कृष्णा (सिंह) (श्री बाबू) सिन्हा (1887-1961), बिहार केसरी के रूप में जाना जाता है, बिहार के  (1946-1961) के पहले मुख्यमंत्री थे. प्रख्यात राष्ट्रवादी डॉ. राजेंद्र प्रसाद और Dr.Anugrah नारायण सिन्हा और श्री बाबू आधुनिक बिहार के आर्किटेक्ट्स  माना जाता है ..  श्री बाबू पहले कांग्रेस मंत्रालय से 1937 में 1961 तक  बिहार के मुख्यमंत्री रहे .  श्री कृष्णा सिन्हा ने प्रतिष्ठित बैधनाथ धाम मंदिर में है दलितो को प्रवेश कि अनुमती दिलयी..उनके नेतृत्व में दलित उत्थान और सामाजिक प्रतिबद्धता तथा दलितों का सशक्तिकरण किया गया.. श्री कृष्ण सिन्हा ने देश के पहली बार मुख्यमंत्री थे जिन्होने बिहार में जमींदारी प्रथा की समाप्ति करायी... 

आजादी की जंग मे  आठ साल  कारावास मे बिताया..

हाल ही में भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने  बाबू और भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच विनिमय पत्रो की र एक पुस्तक जारी की . 

नेहरू श्री बाबू के पत्राचार मे मुख्य रूप सेविभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दो जैसे  भारतीय लोकतंत्र  और आजादी , राज्यपाल, केन्द्र राज्य संबंधों की भूमिका, नेपाल, जमींदारी उन्मूलन और शिक्षा के परिदृश्य में अशांति है..
 श्री बाबू. को उसकी विद्वता और पांडित्य  के लिए जाना था.उन्होने खुद ही 17000 पुस्तकों के अपने निजी संग्रह को 1959 में मुंगेर में श्री कृष्णा सेवा सदन नामक सार्वजनिक बना दिया.

परिवार

श्री बाबू का जन्म अपने नाना के  घर में 21 अक्टूबर 1887 को खन्वा में हुआ था.. आपका पैतृक गांव मौर मुंगेर जिले (शेखपुरा जिले) था . उनके पिता एक धार्मिक विचार वाले, मध्यम  भूमिहार ब्राह्मण थे. उसकी माँ भी एक बहुत ही सरल और धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थी.  जब श्री बाबू सिर्फ पाँच साल के थे तब ही मां की मृत्यु हो गई.  अपने गांव के स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पाकर बाद में 1906 में पटना कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय में शामिल हुए. वे वकालत पडे और  मुंगेर मे 1915 से अभ्यास शुरू.किय.. इस दौरान, उन्होंने शादी की और दो बेटों, शिवशंकर  सिंह और बन्दिशंकर  का जन्म हुआ.


आजादी...Freedom struggle

वह पहले केन्द्रीय हिंदू कॉलेज, बनारस और बाद शाह मुहम्मद जुबैर के घर पर  महात्मा गांधी से मिले. मुंगेर में  करने के लिए ब्रिटिश शासन से भारत को मुक्त की कसम खाई. वह 1915 में कानून का अभ्यास शुरू कर दिया था, लेकिन उसे छोड़ दिया करने के लिए 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे.

 शाह मुहम्मद जुबैर के घर पर 1922 में पहली बार  गिरफ्तार किया गया था और कांग्रेस सेवादल को गैरकानूनी घोषित कर दिया. इस कार्रवाई के बाद लोगों द्वारा इन्हे बिहार केसरी घोषित किया गया .  जेल से 1923 में रीहा किया गया था और तुलसी जयंती के दिन  सेंट्रल स्कूल, खड़गपुर मे भारत दर्शन पर नाट्क प्रदर्शन किया गया. उसी वर्ष में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य बन गए.

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1927 में, वह विधान परिषद के सदस्य बने और 1929 में बिहार प्रदेश कांग्रेस समिति के महासचिव बन गए. 1929 में प्रसिद्ध स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा शुरू   किसान सभा के महासचिव बने . 1930 में, श्री बाबू में नमक  सत्याग्रह किया. गिरफ्तारी के दौरान  हाथ और छाती को जला कर गंभीर चोटे दी गयी.  सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उन्होंने दो साल के लिए  गिरफ्तार किया गया था .  गांधी इरविन संधि के बाद छोड दिया गया  और फिर से  किसान सभा के साथ काम शुरू कर दिया.
 9 जनवरी, 1932 पर वह फिर से गिरफ्तार कर लिया और दो साल कीकठोर कारावास और१००० रुपये का जुर्माना किया गया था . वह हजारीबाग जेल से अक्टूबर, 1933 में छुटे.  1934 बिहार में भूकंप के बाद उन्होंने राहत और पुनर्वास का काम किया...  1934-37 से मुंगेर जिला परिषद के अध्यछ थे. सन् 1935 में, वह सेंट्रल असेंबली के सदस्य बन गए.
20 जुलाई 1937 मेंजब कांग्रेस सत्ता में आया,तब आप को बिहार प्रांत के प्रीमियर प्रधानमंत्री बनया  गया  था. वे और  उनके करीबी सहयोगी बिहार विभूति अनुग्रह बाबू राजनीतिक कैदियों के रिहाई के मुद्दे पर  राज्यपाल के साथ असहमत थे और इस्तीफा दे दिया. तब राज्यपाल ने इनके सभी माग को  स्वीकार किया . पुनः कार्य भार लिया. लेकिन  द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय लोगों की सहमति के बिना भारत को शामिल करने के सवाल पर फिर से 1939 में  सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया.
1940 में, रामगढ़,  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 53 वें नेशनल कन्वेंशन मे महात्मा गांधी की प्रेरणा पर बिहार से पहली बार व्यक्तिगत सत्याग्रही बने .जब भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में शुरू की, तब 10 अगस्त को  गिरफ्तार किया गया और नौ महीने के लिए जेल  (22 नवम्बर 1940 - 26 अगस्त 1941).  1944 में हजारीबाग जेल से रिहा किया गया.... 
उसी वर्ष में उन्होंने वेल्स मेडिकल कॉलेज मे अपनी पत्नी को खो दिया. 

 शिमला सम्मेलन में भाग लिया और भारत के संविधान सभा के सदस्य भी थे. 

डा. सिन्हा  लगातार 73 वर्ष की उम्र  मे अपने 31 जनवरी 1961  से मृत्यु तक बिहार की सेवा की. 1978 में उनके सम्मान में, संस्कृति मंत्रालय  श्रीकृष्ण विज्ञान केन्द्र  संग्रहालय शुरू कर दिया.  पटना में सम्मेलन कक्ष, श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल  भी उसके नाम पर है. 

बुधवार, 18 अगस्त 2010

भूमिहार वन्श के उत्पत्ति

वैसे तो भूमिहार वन्श के उत्पत्ति के सबन्ध के इतिहास को प्रचीन किम्दन्तियो के आधार पर अनेक विद्वानो ने लिपिबद करने का प्रयास किया है। ऎस माना जाता है कि भगवान परशुराम जी ने छत्रिओ के खातमे के बाद जीती ज़मीन को उन ब्रहमनो को दे दिया जिन्होने परम्परागत पुजा और दान को छोड जमिदारी और युद मे प्रवीनता हाशिल कर ली थी। ये ब्रह्मन ही भूमिहार ब्रह्मान कहलाये। तभी से परशुराम जी को भूमिहारो का जनक और भूमिहार वन्श का प्रथम सदस्य माना जाता है।

भूमिहार ब्राह्मण शब्द के प्रचलित होने की कथा

भूमिहार ब्राह्मण शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है। सन १८८५ में बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने बिहार एवं उत्तर प्रदेश के जमीनदार ब्राãणों की सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा कि हमारी एक जातीय संगठन होनी चाहिए। संगठन बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे। परन्तु संगठन का नाम क्या हो इस प्रश्न पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया। मगध् के बाभनों ने जिनके नेता स्वर्गीय कालीचरण सिंह थे, संगठन का नामकरण ‘बाभन सभा’ करने का प्रस्ताव रखा। स्वयं बनारस महाराज ईश्वरीय प्रसाद सिंह ‘भूमिहार ब्राह्मण सभा’ नाम के पक्ष में थे। बैठक में नाम के संबंध् में आम राय नही बन पाई। अत: नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति की अनुशंसा पर ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द को स्वीकृत किया गया और इस शब्द का प्रचार-प्रसार करने का निर्णय लिया गया। इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्वर्गीय लंगट सिंह के सहयोग से मुजपफरपुर में भूमिहार कॉलेज खोला गया। बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कॉलेज के नाम से पुकारा गया। आज वही जी.बी.बी. कॉलेज लंगट सिंह कॉलेज के नाम से प्रसिद्व है।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010


Aristotle

In the year 331 B.C. Aristotle visited India and wrote that now the ideas about castes and professions, which have been prevelant from a long time, are gradually dying out, and the Brahmins, neglecting their education.......... live by cultivating the land and acquiring the territorial possessions, which is the duty of Kshatriyas." If things go on in the way, then instead of being(Vidyapati) i.e master of learning, they will become(Bhumipati) i.e master of land."
Fahian

In the year 399 A.D. Fahian came to India and he wrote "The Brahmins having given up asceticism........... are ruling here and there in the place of Kshatriya and are called Sang he Kang ( land-seizer)."The land-sezier word indicate Bhumihar Brahmins.
Dr. Wilson

Dr. Wilson in his book "Indian castes" part II page 134 has decribed The Mohiyal( synonym of Bhumihar Brahmin) as mentioned below:
Saraswat Brahmins: Another class of the character refers to is that of the Moyals or movals. They are extensively scatterd over the Punjab.
Taga(Tyagi) Brahmins of the Punjab are generally cultivators. They belong to the Gauda division of the Brahmin-hood. They care little about religious rites of any kind..... They are found principally on the banks of the Saraswati, near Thanser, some of the less pure agriculture Brahmin of these villages are called Taga of Gauda Tagas. (Tyagi is the synonym for Bhumihar Brahmin)
Mr. Crook

Mr. Crook in his book "The Tribes and castes of UP and Oudh" part II, page 64 has written----
Bhumihar(Sanskrit Bhumi and Kara(har) 'maker'): An important tribe and landowners and agriculturists in eastern districts. They are also known as Babhan, Zamindar Brahmin, Grihastha Brahman or Pachchima or "Western Brahmin".
Sir Elliot

According to Sir Elliot's supplemental glossary, there are five divisions of the Kamkoobj Brahmins. They are Kamkoobj proper, Sunadh, Surwaria, Jijhotia and Bhoinhar.
Mr. William Oldham

Mr. William Oldham in his book "NORTH WESTERN PROVINCES HISTORTICAL AND STATICAL MEMOIR" has categorically mentioned that Bhoinhars, both by themselves and by ethnologists, are belived to be the descendants of Brahmins, who on becoming cultivators and landholders gave up their priestly functions.

सोमवार, 2 अगस्त 2010

स्वतंत्रता के दीवाने:-

स्वतंत्रता के दीवाने:-जिनपर हमे गर्व है




स्वामी सहजानंद सरस्वती :उत्तर प्रदेश  देवा, गाजीपुर). सामाजिक कार्यकर्ता, संत,  सबसे प्रभावशाली अग्रणी नेता. किसान सभा का गठन(जो सबसे  किसान आंदोलन बन गया)

बसवोन सिंह (सिन्हा): महान राष्ट्रवादी, मजदूर नेता, बिहार में विपक्ष के पहले नेता. HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) के साथ सक्रिय और बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए. अठारह साल जेल में थे.

पंडित कर्यनन्द शर्मा : महान राष्ट्रवादी और किसान नेता.

योगेन्द्र शुक्ल:मुजफ्फरपुर,(अब वैशाली) बिहार , महानतम राष्ट्रवादियो मे एक, अंडमान (मे कलापानी कि सज़ा गुजारी), HSRA के संस्थापकों (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) मे एक.. भगत सिंह और बतुकेशेवर दत्त के सहयोगी.  सोलह साल जेल  क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए.

बैकुन्ठ शुक्ल: महान राष्ट्रवादी जो फनिन्द्रननाथ घोष की हत्या के दोषि, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के सह्योगी. योगेन्द्र शुक्ला के भतीजे.  'नमक सत्याग्रह 1930 'मे सक्रिय. सेवादल हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन और हिंदुस्तान एसोसिएशन जैसे क्रांतिकारी संगठनों के साथ जुड़े. 14 मई 1934 को गया सेंट्रल जेल में फांसी लगा ली. वह केवल 28 साल के थे.

चंद्रमा सिंह: राष्ट्रवादी,बैकुन्ठ शुक्ला के सहयोगी होने के लिए कारावास.

सर गणेश दत्त सिंह: 1923 से बिहार प्रांत में ही मंत्री, विश्व वेल्स मेडिकल कालेज, पटना विश्वविद्यालय, दरभंगा मेडिकल स्कूल आदि के प्रसिद्ध प्रिंस शुरू


श्री कृष्णा सिन्हा: राष्ट्रवादी और बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री. बिहार के शेखपुरा जिले के मौर गांव से थे.

राम दयालु सिंह: बिहार विधानसभा के पहले अध्यक्ष.मुलत मुजफ्फरपुर गंगवा से.

राम बिनोद सिंह: महान राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी. जो आचार्य भगवानदास कृपलानी के सहयोगी, स्वतंत्रता संग्राम मे कॉलेज के दिनो से ही. वास्तव में, Acaryaji भी अपनी आत्मकथा में किया है उसके बारे में उल्लेख किया है "मेरे" समय.

राम नंदन मिश्र: राष्ट्रवादी और समाजवादी . लोकनायक जयप्रकाश नारायण के एक करीबी सहयोगी.अंग्रेजों के खिलाफ भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व. आजादी के बाद वह संत बन गये हैं.राम मनोहर लोहिया हमेशा अपने गुरु के रूप में मनते थे.

पंडित राज कुमार शुक्ल "चंपारण सत्यग्रही",  गांधीजी द्वारा  अपने आत्म कथा मे राज कुमार शुक्ल क बखान किया है,  राज कुमार शुक्ल का गुणगान डॉ. राजेन्द्र (भारत के प्रथम राष्ट्रपति) प्रसाद, आचार्य कृपलानी और महात्मा गाधी ने किया.

महावीर त्यागी: राष्ट्रवादी और सांसद.

पंडित यमुना करजी:  दरभंगा बिहार में पूसा के निकट एक छोटे से गाँव  में 1898 में पैदा हुए.  अध्ययन-प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता . कानून में डिग्री . कलकत्ता में  कई स्वतंत्रता सेनानियों के साथ संपर्क  था.  एक हिन्दी साप्ताहिक हिन्दी भारत मित्र के संपादकीय मे कलकत्ता में पत्रकार थे. गांधीजी के असहयोग आंदोलन 1920-21 मे हिस्सा है. सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए 1929-30 में जेल. वह 1937 में कांग्रेस के एक candidate.He 1947-48 में बिहार पत्रकार संघ के अध्यक्ष के पद के लिए चुने गए के रूप में बिहार और उड़ीसा विधानसभा के लिए पहली बार चुनाव जीता.

शील भद्र (1906-1996): बिहार से स्वतंत्रता सेनानी. अहिंसक और स्वतंत्रता संघर्ष का हिंसक फार्म के साथ जुड़े. उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट Partyand शामिल हुए किसान आंदोलन में शामिल हो गया. वह सुभाष चंद्र बोस के साथ निकट संपर्क में आया, और साथ ही महात्मा गांधी. 1939 में उन्होंने सुभाष चंद्र बोस शामिल करने के लिए अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक मिला. , समाजवाद भारत के लिए एक आवश्यकता को सक्रिय रूप से वह आई एन ए 'भारतीय श्रम' आंदोलन ', फॉरवर्ड ब्लॉक और' खड़े हो जाओ इसकी की एक झलक की तरह कई पुस्तकें लिखी movement.He के साथ जुड़े थे 'है, और सच का चेहरा एकाधिकार अमेरिकी लोकतंत्र भारत सरकार. 28/01/2001 पर उस पर एक स्मारक डाक टिकट जारी [.]

गंगा शरण सिंह: साहित्यकार और राष्ट्रवादी. वह 1956 से राज्यसभा के सदस्य 1974 तक गया था. वह ऊपरी सदन के लिए चुने गए बहुत बाद में. वह जय प्रकाश नारायण के करीब के रूप में अच्छी तरह के रूप में श्रीमती इंदिरा गाँधी था.

पंडित.जदुनन्दन शर्मा: प्रख्यात राष्ट्रवादी और किसान नेता.

प्रस्सना सिन्हा सिंह (किशोरी): नेशनलिस्ट.

मिथिलेश नारायण सिंह: नेशनलिस्ट

राय जगन्नाथ सिंह: राय हृदय नारायण सिंह, एक परोपकारी ब्रिटिश प्रशासन के पास के महान पोता. वह एक स्वतंत्रता सेनानी थे. अपने धन ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए जब्त किया गया था.

केश्वर वीर सिंह, : प्रख्यात राष्ट्रवादी और किसान नेता.