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मंगलवार, 29 नवंबर 2011

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर का आरोप

उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक यकायक दो आईपीएस अधिकारियों की ओर से सरकार पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाना ये दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। अभी डीआईजी डीडी मिश्रा के माया सरकार पर आरोपों की झड़ी लगाने के कुछ ही दिन बीते थे कि एक बार फिर एक आईपीएस अधिकारी ने खुद को सरकार द्वार प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाया है। खुद पर प्रताड़ना का आरोप लगाने वाले इस पुलिस अधिकारी का नाम अमिताभ ठाकुर है। उत्तर प्रदेश में यह दूसरी बार है कि एक के बाद एक दो आईपीएस अधिकारियों ने सरकार द्वार खुद को प्रताड़ित किए जाने की बात कही है।
आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने प्रमुख सचिव (गृह) कुंवर फतेह बहादुर मुख्यमंत्री के सचिव विजय सिंह समेत कई दूसरे प्रशासनिक अधिकारियों पर खुद को प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाया है। अमिताभ ने बताया कि उन्हें लंबे समय से परेशान किया जा रहा है। अमिताभ ठाकुर का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका भी दायर की है जिसमें प्रताड़ना की बात कही गई है।
आपको बता दें कि यह कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले अग्निशमन विभाग में पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) डी डी मिश्रा ने राज्य की मायावती सरकार को भ्रष्टाचार में डूबी व महाचोर सरकार करार दिया था। इसके बाद 4 नवंबर को सरकार ने उन्हें मानसिक रूप से बीमार करार देकर जबरन राजधानी के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय में भर्ती करा दिया था, जहां चिकित्सकों ने उन्हें बाई-पोलर डिसआर्डर से पीड़ित करार दिया था। मिश्रा को 9 नवंबर को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। इसके बाद मिश्रा का तबादला भ्रष्टाचार निवारण विभाग में डीआईजी के पद पर कर दिया गया।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

बिहार आईआईएमएस में हम



डा अरूण कुमार                                    निदेशक

डा यू एस राय                            चिकित्सा अधीक्षक

डा संजय कुमार सिंह                  उप चिकित्सा अधीक्षक

डा महेंद्र सिंह                                    डीन

डा उदय कुमार                               सब डीन


रमाशंकर चौधरी                                 सहायक

बुधवार, 21 सितंबर 2011

अब भी बोलो क्या बोलोगे मेरा देश महान है



नौकरशाही के दीमक से घुन गया संविधान है
अब  भी बोलो क्या बोलोगे मेरा देश महान है 

चमचम दिल्ली उचे होटल क्या नहीं है एक छलावा
यहाँ तो दो जून की रोटी  को भी  मोहताज़  किसान  है

तमगो  और   पैसो  के  खातिर  मर्डर  यहाँ  पुलिस  है करती
इन्कउन्टर  के  नाम  पर  बड़ती पुलिस की   शान  है
अब  भी बोलो क्या बोलोगे मेरा देश महान है

हरे खेत भरे खलियान अर्थ शास्त्री  प्रधानमंत्री
फिर भी महगाई देखो छूने लगी  आसमान है
अब  भी बोलो क्या बोलोगे मेरा देश महान है

राजनीत  की  गजब कहानी  
जीतनी  समझो  उतनी  अनजानी
चंद  वोट   में ही  बिकता  मंत्रालय  खुल कर बिकता  इमान  है
अब  भी बोलो क्या बोलोगे मेरा देश महान है

धर्म  वाद  है जाति  वाद  है मानववाद  ना  कही यहाँ है 
सेकुलर  होना  जहा  गाली   के  सामान  है
अब  भी बोलो क्या बोलोगे मेरा देश महान है



लाशो  पर  सेक  सेक  कर  पकती  है कुर्सी  की  रोटी
हिन्दू  है मुस्लिम  है पर  नहीं मिलता  एक  अदद  इंसान  है
अब  भी बोलो क्या बोलोगे मेरा देश महान है


पुनीत कुमार राय

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

आरछ्ण


पढने लिखने से क्या मिलेगा
आइ ए स भी न बन पाउगा
भाइ मुझे दो हजार दे दो 
कट्टा खरिद कर लाउन्गा

नेता या किसी सेठ के छोरे को उठाउन्गा
अपहरण से पहले लाखो कमाउन्गा
पुलिस उलिस की फ़िकर ना कर
तुझे भी हर देश घुमाउन्गा

 देखा है मैने तुझको 
ज्यादा नबर पाकर  रोते
उस हरिया का नाती को 
३३% पा कर अफ़सर होते

हरिया को नही
इस आरछ्ण डाइन को मुआउन्गा
भाइ मुझे दो हजार दे दो 
कट्टा खरिद कर लाउन्गा

अहिसा से ना भागे अग्रेज
ये सच्चाई मान लिया है
गाधी और नेहरु को तो
अब मैने भी जान लिया है

एक छोटे से नाटक से कैसे 
सत्ता है हड्पते
कैसे नेता जी से दानी
कागज मे ही मरते

हिन्दु और मुस्लिम पर
कैसे राजनीति है करते
बनना है भगत सिहं राजगुरु
और लड्ना है इन  सब से 

भाइ मुझे दो हजार दे दो 
कट्टा खरिद कर लाउन्गा

क्यो घोटलो पर चुपी छायी
जज क्यो कुछ  नही करते 
जनता की गाढी कमायी से
कैसे स्विस बॆक भरते

देखा है सुभाष चंद के 
नेता के आदरशो को घुट घूट कर मरते
भाइ मुझे दो हजार दे दो 
कट्टा खरिद कर लाउन्गा

मु०मत्री को पैसे देकर 
सीधे ए०म०एल०सी० बनगाउन्गा
अगर जुगाड लग गया तो
राज्यसभा पहुच जाउन्गा

ठाकुर हो या भुमिहार
क्यो दीन हीन मजबुर है
इन  sc st को आखिर
किस बात का गरुर है

बस भरोसा रख मुझ पर
देश के भी काम आउन्गा
अपने जैसे हजारो को 
ससंद पहुचाउन्गा

नया विधेयक लाकर
आरछ्ण को हटाउन्गा
नया सवेरा आयेगा
कुछ यु इतिहास बनाउन्गा

न्याय को सर्वसुलभ बनाकर
८०% समस्या मिताउन्गा

भाइ मुझे दो हजार दे दो 
बन्दुक खरिद कर लाउन्गा





रविवार, 12 सितंबर 2010

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

भूमिहार समाज दलबदलू नेताओं से परेशान

भूमिहार समाज दलबदलू नेताओं से परेशान.......

चौथी दुनिया ब्यूरो




कहावत है कि मेढकों को तराजू में नहीं तौला जा सकता. राजनीति में भी यह कहावत लागू होती है. और बात जब भूमिहार नेताओं की आती है तो यह अक्षरश: साबित होती है. नेताओं में मेढकों की तरह उछल-कूद की प्रवृत्ति से भूमिहार समाज हैरान-परेशान है. ऐसा करने वाले नामों की फेहरिस्त लंबी है. इनमें पूर्व सांसद अरुण कुमार, विधान पार्षद नीरज कुमार, पूर्व मंत्री वीणा शाही, श्यामसुंदर सिंह धीरज, रामजतन सिन्हा, जहानाबाद के सांसद जगदीश शर्मा, लालगंज के विधायक मुन्ना शुक्ला एवं पूर्व सांसद सूरजभान आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं. ताजा मामला जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार का है. वह भी नीतीश कुमार का नेतृत्व कबूल करने के लिए तैयार हो गए हैं, जबकि जदयू द्वारा राज्यसभा में भेजे गए उपेंद्र कुशवाहा ने सवर्णों को काफी भला-बुरा कहा था. पटना में आयोजित जगदेव प्रसाद जयंती समारोह में उपेंद्र कुशवाहा ने सरेआम कहा था कि पिछड़े गालियां बर्दाश्त नहीं करेंगे. यदि कोई पिछड़ों को गाली देगा तो उनके हाथ गाली देने वालों की गर्दनों तक पहुंच जाएंगे. अपने राजनीतिक वनवास के समापन को बेचैन अरुण कुमार समाज के अपमान को भूल गए. उपेंद्र कुशवाहा का बयान ललन सिंह को केंद्र में रखकर आया था. नीतीश कुमार से ललन के अलगाव का कारण भी उपेंद्र कुशवाहा थे. कांग्रेस में मान-सम्मान मिलने के बावजूद अरुण कुमार दोबारा नीतीश के सिपहसालार बनने को तैयार हो गए, जबकि उनके खिला़फ बाढ़ की अदालत द्वारा सम्मन जारी करने के मामले में शासन ने बतौर साजिशकर्ता अरुण कुमार को लक्षित किया था. पंडारक के ढीबर निवासी रामानंद सिंह के कथित अपहरण के मामले में अरुण कुमार के घर पुलिस का छापा पड़ा था. कांग्रेस कार्यकर्ता की हत्या के मामले के गवाह रामानंद सिंह की बरामदगी भी पुलिस ने अरुण कुमार के आवास से दिखाई थी. 1990 में गया स्नातक क्षेत्र से विधान पार्षद चुने गए अरुण बाद में नीतीश की शरण में गए थे. युवा समता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके अरुण बाद में नीतीश से अलग होकर लालू-रामविलास का समर्थन पाकर नालंदा से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार ताल ठोंकने लगे थे. लोजपा में शामिल होकर राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त हुए अरुण 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की शरण में चले गए, क्योंकि राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने अरुण कुमार के लिए जहानाबाद सीट छोड़ने से मना कर दिया था. कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले अरुण अब फिर से समाज को ठगा हुआ महसूस कराकर जद (यू) में लौट चुके हैं. उन्होंने कभी कहा था कि भूमिहार समाज राजनीति में कहार की भूमिका में है और यह बिरादरी पालकी ढोने का काम करती है. नीतीश, लालू, रामविलास और कांग्रेस की पालकी ढोकर उन्होंने अपने बयान को सही ठहराया.


जहानाबाद के सांसद जगदीश शर्मा की पलटमारी ने तो सबको हतप्रभ कर दिया. विधानसभा उपचुनावों में पार्टीं लाइन के विपरीत जाकर जगदीश शर्मा ने अपनी पत्नी शांति शर्मा को घोसी से उतारा तो सरकार के निर्देश पर एसटीएफ को उतार दिया गया था. जगदीश शर्मा के समर्थकों की मतदान के दिन चुन-चुनकर पिटाई की गई.
मोकामा के एमएलसी नीरज कुमार का राजनीतिक जीवन भी हनुमान कूद का रहा है. भाकपा के बैनर तले राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले नीरज कांग्रेस, भाजपा, समता पार्टी के रास्ते जद (यू) की राजनीति में सक्रिय हैं. अरुण कुमार जब समता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे, तब नीरज उनकी समिति में प्रधान महासचिव थे. अरुण ने जब नीतीश का साथ छोड़ा तो नीरज वर्तमान मुंगेर सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के साथ हो लिए. पटना स्नातक विधान परिषद चुनाव में नीरज के अलावा वेंकटेश उर्फ डब्लू एवं रमेश सिंह प्रमुख दावेदार थे. डब्लू को शिवप्रसन्न यादव की मार्फत शरद यादव का वरदहस्त प्राप्त था और पूर्व एमएलसी अधिवक्ता रमेश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पसंद थे. लेकिन ललन सिंह ने ताक़त लगाकर न स़िर्फ नीरज को उम्मीदवारी दिलाई, बल्कि उनकी जीत भी सुनिश्चित कराई. जब नीतीश कुमार से ललन सिंह की दूरी बढ़ी और ललन ने किसान महापंचायत का झंडा बुलंद किया, तब नीरज किसान रथ लेकर बिहार की सड़कों पर दौड़ने लगे. नीरज के कारनामे को अवसरवादिता की पराकाष्ठा माना गया.
जहानाबाद के सांसद जगदीश शर्मा की पलटमारी ने तो सबको हतप्रभ कर दिया. विधानसभा उपचुनावों में पार्टीं लाइन के विपरीत जाकर जगदीश शर्मा ने अपनी पत्नी शांति शर्मा को घोसी से उतारा तो सरकार के निर्देश पर एसटीएफ को उतार दिया गया था. जगदीश शर्मा के समर्थकों की मतदान के दिन चुन-चुनकर पिटाई की गई. जद (यू) से निलंबित होने के बाद किसान महापंचायत के शुरुआती दिनों में समर्थन करने वाले जगदीश शर्मा ने न स़िर्फ खुद को महापंचायत से अलग कर लिया, बल्कि नीतीश कुमार के इशारे पर अब स्वामी सहजानंद किसान महाचौपाल के आयोजन में भी जुटे हैं. पूर्व मंत्री वीणा शाही ने वर्ष 2000 के विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश की सात दिनी सत्ता के दौरान कहा था कि यदि उनके एक वोट से नीतीश की सरकार बचती है तो वह सरकार बचाएंगी. नीतीश को वोट देने की बात तो दूर, वीणा शाही राबड़ी देवी मंत्रिमंडल में भी बतौर सहकारिता मंत्री शामिल हुईं. वीणा स्व. हेमंत शाही की पत्नी हैं, जिनकी हत्या लालू राज में हुई थी. पूर्व मंत्री श्यामसुंदर सिंह धीरज फिलहाल कांगे्रस में हैं. कांग्रेस के बैनर तले राजनीतिक क्षितिज पर चमकने वाले धीरज बाद में समता पार्टी में गए. नीतीश के साथ साए की तरह चिपक कर रहने वाले धीरज बाद में लालू की शरण में भी गए और फिर थक-हारकर कांग्रेस में वापस आ गए हैं. रामजतन सिन्हा भी दलबदल के लिए चर्चित रहे हैं. कांग्रेस में हमेशा गुटबाजों की अग्रिम पंक्ति में शामिल रहे रामजतन सिन्हा लोजपा के पदाधिकारी बने और फिर बाद में उन्होंने अपना संगठन भी बनाया. वह फिलहाल कांग्रेस में हैं. लालगंज के विधायक मुन्ना शुक्ला दस वर्षों के राजनीतिक इतिहास में कई बार दल बदल चुके हैं. निर्दलीय चुनाव जीतने वाले मुन्ना बाद में लोजपा में शामिल हुए और फिर जद (यू) में आ गए. फिलहाल वह जी कृष्णैया हत्याकांड में सजायाफ्ता होकर जेल में बंद हैं. मुन्ना राजद की ओर हमेशा टकटकी लगाए रहते थे. पूर्व सांसद सूरजभान सिंह की स्थिति फिलहाल बेहतर है. समता पार्टी के समर्थन से 2000 में मोकामा से विधायक बने सूरजभान ने तब निर्दलीय विधायक मोर्चा बनाया और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने में सारी ताक़त लगाकर उनके एहसान का बदला चुकाया. लोजपा प्रत्याशी के तौर पर 2004 में बलिया से सांसद बने सूरजभान ने रामविलास का नेतृत्व कबूल किया और अभी तक उनके साथ बने हुए हैं. सूरजभान ने उस वक्त भी रामविलास का साथ नहीं छोड़ा, जब लोजपा में भगदड़ मच गई थी. बात यदि महाचंद्र प्रसाद की करें तो कांग्रेस के खूंटे से बंध कर रहने के बावजूद समाज के लोगों का कभी उन पर विश्वास नहीं रहा. श्याम सुंदर सिंह धीरज बताते हैं कि समाज में कुछ नेता ऐसे भी हुए हैं, जो मंडल कमीशन का अनावश्यक विरोध कर लालू प्रसाद की राजनीति मजबूत करते रहे. जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे पत्रकार वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि मंडल आयोग का कतिपय लोगों ने ज़रूरत से ज़्यादा विरोध किया और यही कारण है कि अगड़ा-पिछड़ावाद को बढ़ावा मिला और सवर्ण समुदाय राजनीति में हाशिए पर चला गया. विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक पलटमारी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. भूमिहारों के बड़े तबके का मानना है कि नीतीश कुमार की राजनीति जब पिछड़ा-अति पिछड़ा-महादलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे आगे बढ़ेगी तो फिर बिरादरी के नेता क्यों नीतीश का साथ कबूल करने को बेताब हैं. नीतीश से नाराज भूमिहारों का एक बड़ा तबका राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की ओर टकटकी लगाए बैठा है, जो सार्वजनिक सभाओं में खुद को सफल सर्जन बताते हुए नीतीश के पेट में छिपे दांत बाहर निकालने की बात कह रहे हैं. देखना दिलचस्प होगा कि ललन सिंह क्या गुल खिलाते हैं.

सोमवार, 23 अगस्त 2010

28 सुरजपुर ........

महान क्रांतिकारी बाबू मगंरु राय, बाबू क्र्ष्णदेव राय के नाम पर २८  अगस्त को सुरजपुर मऊ में रोड के शिलान्यास  कार्यक्रम  आयोजित किया गया है..जिसमे मऊ के डी एम सहित जनपद के अनेक गणमान्य लोगो सम्मिलित होंगे...........आप सभी सादर आमन्त्रित है.............

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

शायद अगर इसाफ़ तभी हो जाता तो यह नॊबत नही आती....अंकुर राय .... पिता की हत्या का बदला

पूर्व विधायक कपिलदेव यादव की चार जुलाई को घोसी कोतवाली क्षेत्र के मझवारा बाजार में दिनदहाड़े हत्या कर दी गयी थी।

एडीजी बृज लाल ने बताया कि राज्य मानवाधिकार आयोग (एसएचआरसी) के सामने दो युवकों ने पेश होकर एसपी के पूर्व एमएलए की हत्या में अपना हाथ होना कबूल किया है। दोनों ने बताया कि पुरानी दुश्मनी के चलते उन्होंने एसपी के पूर्व विधायक की हत्या की। दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

प्रारंभिक जांच के अनुसार हत्या के एक पुराने मामले, जिसमें एसपी के पूर्व विधायक कथित रूप से आरोपी थे, का बदला लेने के लिए आरोपियों ने हत्या की वारदात को अंजाम दिया। कपिल देव राय की हत्या में गिरफ्तार आरोपी अंकुर राय ने बताया कि उसके पिता की फरवरी 2001 में हत्या कर गई थी। इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिसमें पवन कुमार यादव, अशोक और पूर्व विधायक कपिल देव यादव को नामजद किया गया था।शायद अगर इसाफ़ तभी हो जाता तो यह नॊबत नही आती.

एसपी ओंकार सिंह ने बताया कि 24 फरवरी 2001 को सहरोज के अंकुर के पिता रामदरस राय की हत्या हुई थी। इसमें पवन यादव व अशोक के साथ ही पूर्व विधायक कपिलदेव भी आरोपी थे। अंकुर ने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए कपिलदेव की हत्या कर दी। पुलिस कप्तान ने बताया कि 2006 में कपिलदेव यादव के काफिले पर फायरिंग की गयी थी। उसमें मनोज राय भी अभियुक्त हैं। मनोज अपने प्रतिद्वंद्वी पूर्व विधायक को रास्ते से हटाकर वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे। इसके चलते अंकुर राय के साथ योजना बनाकर इस घटना को अंजाम दिलाया।

बृजलाल के अनुसार कपिल देव यादव ने अंकुर राय के पिता की हत्या की थी, जिसका बदला लेने के लिये अंकुर राय बेचैन था।

आखिर  बृजलाल जी ये क्यो नही समझ रहे कि हत्यारा अन्कुर नही कानून व्यवस्था है जिसने कलम पकड्ने वाले हाथो को खून के रंग दिया

बुधवार, 18 अगस्त 2010

.सच कितने भूलक्कड है हम

आप को याद है ना वो  मुंबई की सड़क पर सरेआम पिस्तौल लहरा रहा युवक -राहुल राज.  राहुल राज इनकाउंटर की  नैतिकता और लाखों वादे

 इस घटना से बाद  बिहार में जगह-जगह ट्रेनें जला रहे, तोड़फोड़, पथराव कर रहे छात्र राज ठाकरे से अधिक अपने नेताओं लालू-नीतीश के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर रहे थे. नारे लगा रहे थे. उनमें यह भाव था कि पलायन की विवशता के लिए जिम्मेवार अपने ही नेता हैं. राहुल राज के इनकाउंटर के बाद ही  राजनेताओं ने राहत की सांस ली. लालू, नीतीश व रामविलाजी ने उसे शहीद, शेरे बिहार, बिहार का सपूत और न जाने क्या-क्या कहा. इससे एक रोज पहले तक नीतीश महाराष्‍ट्र में बिहारी युवकों की पिटाई के बाद बिहार में घट रही तोड़फोड़ की घटनाओं से बेहद चिंतित थे. उन्होंने संचार माध्यमों को कहा था कि न कुछ ऐसा छापा जाए, न दिखाया जाए, जिससे बिहार की भावना भड़के. लेकिन इस युवक के मारे जाने के बाद परिदश्‍य बदल गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, रेलमंत्री लालू प्रसाद व रसायन मंत्री रामविलास पासवान अपने-अपने तरीके से राहुल राज के एनकाउंटर को को तूल देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वास्तव में राहुल की हत्या ने ही बिहारी आक्रोश की धारा पूरी तरह राज ठाकरे और महाराष्‍ट्र सरकार की ओर मोड़ दी है. बिहार के राजनेताओं का अभिष्‍ट भी यही था. राजनताओं में राहुल की अंतयेष्टि में शामिल होने, उसके घर जाकर सांत्वना देने की होड़ लग गयी. नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी (उपमुख्यमंत्री), दीपंकार भट्टाचार्य (माले महासचिव), अनिल शर्मा (प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष), समेत कई बडे-छोटे नेता उसके घर पहुंचे. बाहुबली सांसद सूरजभान सिंह, राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (प्रदेष अध्यक्ष, जदयू) गिरिराज सिंह (सहाकारिता राज्य मंत्री, बिहार), अखिलेश सिंह (केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री) समेत एक खास जाति के कई राजनेताओं ने राहुल के घर जाकर 'न्याय' दिलाने का वादा किया.

 लालू प्रसाद ने राहुल राज की हत्या के बाद टीवी कैमरे के सामने बेतरह गुस्सा दिखाते हुए कहा कि महाराष्‍ट्र सरकार पगला गयी है. उन्होंने बताया कि राहुल एक 'संभ्रात' परिवार का लड़का था. हमेशा जाति के संदर्भ के साथ बात करने वाले लालू प्रसाद के इस संकेत का अर्थ बिहार के लोग समझते हैं. राहुल का जन्म एक उंची जाति के (भुमिहार) परिवार में हुआ था. लालू कहना चाह रहे थे कि उसे 'गरीब-गुरबा' न समझा जाए. संभ्रांत परिवार का था.


राहुल ने रेडियोलॉजी में डिप्लोमा किया था और २४ अक्टूबर को घर से मुंबई जाते हुए यह कह गया था कि वह नौकरी तलाशने जा रहा है. २५ या २६ अक्टूबर को वह मुंबई पहुंचा और दूसरे दिन ही यह कांड सामने आया. वह पटना के कदमकुआं मुहल्ले के एक मध्यवर्गीय परिवार का लड़का था.


समय बीता और एक बलिदान यू ही भुला दिया हमने....सच कितने भूलक्कड है हम