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सोमवार, 25 जून 2012

प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना / सुभाष राय


सबका सपना
तुम बताओगे प्रेम क्या है?
देह की मादक गहराई में उतर जाने
का पागल उन्माद या कुछ और
तप्त अधरों पर अधरों के ठहर जाने
के बाद की खोज है या कुछ और
मांसल शिखरों पर फिरती ऊंगलियों
से उठती चिनगारी भर या कुछ और
पल भर की मनमोहक झनझनाहट
का लिजलिजा स्खलन या कुछ और

तुम चुप क्यों हो, कुछ बताओ, बोलो
अगर प्रेम किया है कभी तो कैसा लगा
तुम प्रेम के बाद भी बचे रह गये या नहीं
प्रेम के बाद कोई और चाह बची या नहीं
एक बार पूरा पा लेने के बाद भी बार-बार
पाने की उत्कंठा तो शेष नहीं रही

अगर तुमने सचमुच प्रेम किया है
तो मैं जानता हूं तुम चुप रहोगे,
बोलोगे नहीं, बोल ही नहीं पाओगे
ना, तुम सुनोगे ही नहीं मेरा सवाल

प्रेम देह को मार देता है
आंखों का अनंत आकाश एक
दहकते फूल में बदल जाता है
पूरा आकाश ही खिल उठता है
पलकें गिरती नहीं, उठतीं नहीं
कानों में गूंजती है वीणा महामौन की
और कुछ भी सुनायी नहीं पड़ता
फिर कमल हो या गुलाब या गुलदाऊदी
न दिखते हैं, न महंकते हैं, न भाते हैं
गंध में बदल जाता है पूरा अस्तित्व

देह जीते हुए मर जाता है
तो प्रेम जन्म लेता है
जब किसी में उतर जाता है प्रेम
वह जीता ही नहीं अपने लिये
वह रहता ही नहीं अपने लिये

कभी ऐसा हुआ क्या तुम्हारे साथ
याद करो, पीछे मुड़कर देखो
कभी करुणा बही क्या आंखों से
कभी मन हुआ भूख से बिलबिलाते
बच्चे को गोंद में उठा लेने का
सबके दुख-दर्द में शरीक होने का
दूसरों के लिये जीवन लुटा देने का
नहीं हुआ तो सच मानो
तुमने प्रेम नहीं किया कभी
तुम प्रेम की परिभाषाएं चाहे
जितनी कर लो, जितनी अच्छी कर लो
पर प्रेम का अर्थ नहीं कर सकते

प्रेम खुद को मारकर सबमें जी उठना है
प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना है

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

मैं नदी हूँ / सुभाष राय


नदी के पास
होता हूँ जब कभी
बहने लगता हूँ
तरल होकर

नदी को उतर जाने
देता हूँ अपने भीतर
समूची शक्ति के साथ
उसके साथ बहती
रेत, मिट्टी, जलकुंभी
किसी को भी
रोकता नहीं कभी

तट में हो
बिल्कुल शांत, नीरव
या तट से बाहर
गरजती, हहराती
मुझे बहा नहीं पाती
तोड़ नहीं पाती
डुबा नहीं पाती

मैं पानी ही हो जाता हूँ
कभी उसकी सतह पर
कभी उसकी तलेटी में
कभी उसके नर्तन में
कभी उसके तांडव में

फैल जाता हूँ
पूरी नदी में
एक बूँद मैं
महासागर तक

रोम-रोम भीगता
लरजता, बरसता
नदी के आगे
नदी के पीछे
नदी के ऊपर
नदी के नीचे

कैसे देख पाती
वह अपने भीतर
पहचानती कैसे मुझे
ख़ुद से अलग
जब होता ही नहीं
मैं उसके बाहर

जब कभी सूख
जाती है वह
निचुड़ जाती है
धरती के गर्भ में
तब भी मैं होता हूँ
माँ के भीतर सोई नदी में
निस्पंद, निर्बीज, निर्विकार

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

कहाँ है आदमी / सुभाष राय


आदमी है कहाँ, किधर
कोई बताएगा मुझे
चुप क्यों हैं सब के सब
कोई बोलता क्यों नहीं

अपने बच्चों का ध्यान
तो जानवर भी रखते हैं
अगर तुमने भी इतना ही
सीखा अभी तक
तो तुम उनसे अलग कैसे

भैंसे बंधती है
जिसके खूँटे से
दूध देती हैं उसे
तुम भी अगर किसी के
खूँटे से बंध गए हो
क्योंकि वह तुम्हें
डाल देता है चारा
जो वह चबा नहीं पाता
और बदले में दूहता
रहता है तुम्हें
तो तुम पालतू से
ज़्यादा क्या समझते हो
अपने-आप को
कैसे मान लूँ कि तुम
अब कभी दहाड़ सकोगे
निर्भय वनराज की तरह


जिनकी मूँछे बड़ी हैं
जिनकी आवाज़ में
कुछ भी कर गुज़रने का
झूठा ही सही पर
सधा हुआ दर्प है
जो बड़ा से बड़ा अपराध
करके भी हथकड़ियों में
कभी नहीं बंधते
जिनके लिए थाने
घर की चौपाल की तरह हैं
जिन्हें अपनी कुर्सियाँ सौंप
देते हैं सरकारी अफ़सरान
डर से ही सही
जिनका प्रवचन
सभी लगाते हैं सर-माथे
जिनकी ग़ुलामी बजाती हैं
ग़ैरकानूनी बंदूकें

मैंने देखा है
बार-बार उनके दरबार में
दुम हिलाते हुए
पूँछ दबाकर करुणा की
भीख माँगते हुए
निहुरे, पाँवों में गिरे हुए
चारणों की जमात को
गिरवी रख चुके ख़ुद को
निजता से हीन, दीन
मिमियाते, घिघियाते
हुक्म बजाते

इन्हें आदमियों में आख़िर
क्यों गिना जाए
सिर्फ़ इसलिए कि ये
आदमी जैसे दिखते हैं
दो पाँवों पर चलते हैं
कभी-कभी मनुष्य की
आवाज़ निकाल लेते हैं

इन मरे हुओं के हुजूम में
मैं ढूँढ रहा हूं उन्हें
जिनमें आदमीयत बाकी है
कोई बताएगा इनमें
वो कहाँ है, जिसने
बचाया था मासूम लड़की को
ज़िस्मफ़रोशों के चंगुल से
वो कहाँ है जिसने
पड़ोसी के घर में घुसे
आतंकवादी को अपनी
भुजाओं में जकड़ लिया था
और उसकी बंदूक मरोड़ दी थी
और वो कहाँ है
जो अपाहिज हो गया
बलात्कारियों से जूझते हुए
जिसने गाँव की
इज़्ज़त से खेलने वाले
बदमाश को बाइज़्ज़त जमानत
मिलते ही कोर्ट के बाहर
ढेर कर दिया था

मुझे उन कायरों की
कोई दरकार नहीं है
जो सड़क पर लहूलुहान पड़े
बच्चे के पास से गुज़र जाते हैं
फिर भी आँखें पसीजतीं नहीं
मुझे उन हतवीर्यों से क्या लेना
जो चाकू हाथ में लहराते
मुट्ठी भर बदमाशों को
ट्रेन का पूरा डिब्बा लूटते देखते हैं
और इस झूठी आस में
कि शायद वे लुटने से बच जाएँ
अपनी बारी आने तक
जुबान और हाथ
दोनों बंद रखते हैं
मुझे उन बिके हुए लोगों
की भी ज़रूरत नहीं है
जो चोरों, बेइमानों का
रात-दिन गुणगान करते हैं
सिर्फ़फ इसलिए की उन्हें
सरकारी ठेके मिलते रहें
कमीशन बनता रहे

देखो, पड़ताल करो
कोई तो ज़िंदा बचा होगा
किसी की तो साँस
चल रही होगी
कोई तो अपने
लहूलुहान पाँवों पर
बार-बार खड़ा होने की
कोशिश कर रहा होगा
कोई तो अनजान डरे हुए
बच्चे को बाँहों के
घेरे में संभाले
जूझा होगा अपहर्ताओं से
ढंूढो शायद कोई
मंजुनाथ घायल पड़ा हो
कोई सत्येंद्र तुम्हारे आने के
इंतज़ार में हो

रविवार, 26 जून 2011

गांधी की विरासत / सुभाष राय


उसने कहा
बुरा मत देखो
और हमने आंखें
बंद कर लीं
धृतराष्ट्र तो अंधा था
हमने साबुत आंखों
के बावजूद पसंद किया
अंधे की तरह जीना
हम कुछ नहीं देखते
पता नहीं क्या
बुरा दिख जाये
हमारी आंखें बंद हैं
तो मन भला-चंगा है
हमारी कठौती में गंगा है

उसने कहा
बुरा मत सुनो
और हमने सुनना
बंद कर दिया
बहरे हो गय हमे
नहीं पहुंचतीं हम तक
अब किसी की चीखें
किसी पीड़ित की
व्याकुल पुकार
अत्याचार से दम
तोड़ते आदमी का
करुण आर्तनाद
विचलित नहीं करता हमें

उसने कहा
बुरा मत बोलो
मसीहे की बात
कैसे नहीं मानते हम
हम जो भी बोलते हैं
भला बोलते हैं
लोग न समझें तो
हमारा क्या दोष
गूंगे नहीं बन सकते हम
उसकी विरासत
संभालनी है हमें
आजादी बचानी है
लोकतंत्र जमाना है
बहुत भार है हमारे
नाजुक कंधों पर
निभाना तो पड़ेगा
बेजुबान होकर
कैसे रह सकेंगे
कभी अक्षरधाम
कभी कारगिल
कभी दांतेवाड़ा
बहादुरों के जनाजों पर
राष्ट्रगान गाना तो पड़ेगा

वह मसीहा था
बहुत समझदार
नेक और ईमानदार
उसका चौथा बंदर
कभी आया ही नहीं
हमसे यह कहने
कि कुछ करो भी
जनता के लिए
देश के लिए
फिर भी हम नहीं भूले
अपना करणीय
कर्म पथ से नहीं हटे

आइए कभी हमारे
गांव, हमारे शहर
कोई दिक्कत नहीं होगी
जहाज उतर सकता है
ट्रेन भी जाती है वहां से
जगमग, जगमग
जहां दिखे, समझना
हमारा घर आ गया
होटल हैं, स्कूल हैं
अस्पताल हैं
गांव में अब कहां
किस चीज का अकाल है

कर्मयोगी रहे हम
गांधी के सच्चे अनुयायी
सुख-संपदा तो यूं ही
बिन बुलाये चली आयी
सब बापू का है
सब बापू के नाम
उस महात्मा को प्रणाम

शहर में जंगल / सुभाष राय



जंगल चुपचाप
आ गया है शहर तक
आदमी के दिल में
धँसी अपनी जड़ों पर
खड़ा, ख़ून चूसता
निरंकुश फैलता चारों ओर

रास्ते नहीं सूझते
आदमी की बस्तियों में
संकरी होती पगडंडियाँ
खो जाती हैं दीवारों में
कँक्रीट में जमे पुतले
नजर आते हैं इधर-उधर
दौड़ते, भागते, हाँफते हुए

गीदड़ भी हैं यहाँ
वे भाग आए शहरों में
इसलिए नहीं कि
उनकी मौत आई थी
वे मस्त और ज़िंदा हैं यहाँ
उन्होंने अपने नाखून
और बढ़ा लिए हैं
दांत तेज कर लिए हैं
और मरे हुए शेरों की
खालें ओढ़ लीं हैं
वे गुर्राते नहीं
दहाड़ते भी नहीं
चुपचाप धावा बोलते हैं
और चीथड़े कर देते हैं
भूल से भी अकेले
पड़ गये लोगों के
खून इतना मिल जाता है
कि वे भूल चुके हैं
माँस का स्वाद
उन्होंने भुला दिया है
अपना हुआं-हुआं

शेरों से खाली
हो गया है जंगल
या शेर भी गीदड़ों की
शक्ल में ढल गए हैं

भौंकने की आवाज़ें
भी सुनाई पड़ती हैं
घरों में, दफ़्तरों में
गलियों में, सड़कों पर
सीख लिया सबने
हर किसी पर
गुर्राना, दाँत कटकटाना
सबकी पीठ पर
उग आई है पूँछ
लाख जतन करने पर
भी छिपती नहीं
जब भी ज़रूरी होता है
मालिक की खुशी
में हिलती है दुम
और जब भी हिलती है
जाँघिए से बाहर आ जाती है

बड़ी मछलियाँ
खा रही हैं
छोटी मछलियों को
जाल जो स्वप्नजीवी
पुरखों ने बुने थे
छोटे पड़ गए हैं
या कुतर दिये गये हैं
उसमें आकर भी
निकल जाते हैं
लोगों की हड्डियाँ तक
चबा जाने वाले गिद्ध

चहचहाने वाले परिंदे
न जाने कहां खो गए हैं
सुग्गे, तोते, गौरैयां
कहां नज़र आतीं अब

आदमी के भीतर
उग आया है
एक भयानक जंगल
सांप जैसी लपलपाती
रहती है उसकी जीभ
शिकार की तलाश में
काले चमगादड़ों की तरह
उसके पैने दांत
मौका पाकर
किसी की भी
नसों में उतर जाते हैं
और चुपचाप पीने

लगते हैं उसका खून

जंगल शहर में आकर
और हरा-भरा हो गया है
पसर रहा है आदमी की
शिराओं में, धमनियों में
नाड़ियों में, दिमागों में

सुनो जंगल का
नीरव अट्टहास
बहरे नहीं हो गए हो
तो कान लगाकर सुनो
यह ख़ामोश आहट है
लूले-लंगड़े गणतंत्र को
चीरकर उगते
भयानक, खूँखार
जंगलराज की


मुल्क का चेहरा / सुभाष राय


मैं एक चेहरा बनाना चाहता हूं
पर अधूरा रह जाता है बार-बार
न जाने क्यों बनता ही नहीं
मेरे पास हर तरह के रंग हैं
लाल, पीले, नीले, चटख
सफेद और काले भी
मेरी तूलिका में भी कोई खराबी नहीं है
इसी से मैंने अपनी तस्वीर बनायी है
बिल्कुल साफ-सुथरी
मैं पूरा दिखता हूं उसमें
जो भी मुझे पहचानता है
तस्वीर भी पहचान सकता है
उसकी आँखों में झांककर
पढ़ सकता है मेरा मन
इसी तूलिका से मैंने कई
और भी तस्वीरें बनायी हैं
सब सही उतरी हैं कैनवस पर

मैंने एक मजदूर की तस्वीर बनायी
उसके चेहरे पर अभाव और भूख
साफ-साफ झलकती है
उसे कोई भी देखे तो लगता है
वह तस्वीर से बाहर निकल कर
कुछ बोल पड़ेगा
बता देगा कि उसकी बीवी
किस तरह बीमार हुई और चल बसी
उसका बच्चा क्यों पढ़ नहीं सका
वह स्वयं तस्वीर की तरह
जड़ होकर क्यों रह गया है

मैंने एक सैनिक की तस्वीर बनायी
वह अपनी पूरी लाचारी के साथ
मेरे रंगों से निकल कर
कैनवस पर आ गया
वहां घना जंगल है
वहां दो देशों की सीमाएं मिलती हैं
वहां आपस में गुत्थमगुत्था होते लोग हैं
एक-दूसरे को मार डालने पर आमादा
सैनिक के पास बंदूक है
उसे लड़ने का हुक्म भी है
पर वह तब तक गोलियां
नहीं चला सकता
जब तक उसकी जान खतरे में न हो
तस्वीर देखने पर लगता है
वह कभी भी पागल हो सकता है

मैंने एक बच्चे की
तस्वीर बनायी
वह हंस रहा था
वह मेरी तूलिका और
रंग से खेलना चाहता था
वह कैनवस पर आ ही नहीं रहा था
वह मुझे चकमा देकर
निकल जाना चाहता था
कभी रंगीन गुब्बारा उठाता और
उसे फोड़कर खिलखिला पड़ता
कभी बैट उठा लेता और
भाग जाना चाहता मैदान की ओर
कभी रोनी-सी सूरत बनाकर
मां को आवाज देता
भविष्य को ठेंगे पर रखे
कभी चिल्लाता, कभी
सरपट दौड़ लगा देता
कभी मेरा चश्मा उतार लेता
तो कभी मेरी पीठ सवार हो जाता
वह तस्वीर में है पर नहीं है

मैंने एक आधुनिक संत की तस्वीर बनायी
मैं नहीं जानता कैसे वह पूरा होते होते
शैतान जैसी दिखने लगी
उसके चेहरे पर लालच, क्रूरता
निर्ममता, धूर्तता सब कुछ
दिखायी पड़ रही है
मैं उसे देख बुरी तरह डर गया हूं
लोगों को सावधान करना चाहता हूं
पर कोई मेरी बात सुनता ही नहीं
लोग आते है, झुककर माथा नवाते है
कीर्तन करने लगते हैं,
गाते-गाते होश खो बैठते हैं
और चीखते, चिल्लाते
सब हार कर इस तरह लौटते हैं
कि तौटते ही नहीं कभी

मेरी तूलिका ने हमेशा मेरा साथ दिया
मेरे रंग कभी झूठे नहीं निकले
पर मैं हैरान हूं, इस बार
सिर्फ एक चेहरे की बात है
मैं बनाना चाहता हूं
एक ऐसा चेहरा
जिसे मैं मुल्क कह सकूं
जिसमें सभी खुद को निहार सकें
पर बनता ही नहीं
कभी कैनवस छोटा पड़ जाता है
कभी पूरा काला हो जाता है
मुझे शक है कि मुल्क का चेहरा
है भी या नहीं

मेरा परिचय / सुभाष राय


मेरा परिचय
उन सबका परिचय है
जो सोए नहीं हैं जनम के बाद
लपट है जिनके भीतर

जिसे छू दें भस्म कर दें
जिस पर हाथ रख दें
वह पिघलकर बहने लगे

चल पड़ें तो
ज़मीन अगिया जाए
रास्ते की धूल
धुआँ बन जाए

बोलें तो बिजलियाँ कड़क उट्ठें
लिखें तो शब्द-शब्द
सोए दिमागों पर
अग्निवाण की तरह बरसें

जो ख़ुद से टकरा रहे हों
टुकड़े-टुकड़े हो रहे हों
जो धधकते रहते हों
पृथ्वी के गर्भ की तरह
ज्वालामुखी बनने को आतुर
लावा से नया रचने को बेचैन
सूर्य को अपने भीतर समेटे
खौलते हुए

मेरा परिचय
उन अनगिनत लोगों
का परिचय है
जो मेरी ही तरह
उबल रहे हैं लगातार

जो दीवारों में
चुने जाने से ख़ुश हैं
उनसे मुझे कुछ नहीं कहना
जो मुर्दों की मानिंद
घर से निकलते हैं
बाजारों में ख़रीदारी करते हैं
और ख़ुद ख़रीदे हुए
सामान में बदल जाते हैं
वापस घर लौटकर
सजे हए कफ़न में
क़ैद हो जाते हैं चुपचाप

जो सिक्कों की खनक
पर बिक जाते हैं
चुराई हुई ख़ुशी में
खो जाते हैं

वे टूट सकते हैं आसानी से
उनकी उँगलियाँ
कटार नहीं बन सकतीं
उनके हाथ लाठियों में
नहीं बदल सकते

वे रोटियाँ नहीं खाते
रोटियाँ उन्हें खाती हैं
ऐसे मुर्दों पर गँवाने के लिए
वक़्त नहीं है मेरे पास

मैं अपने जैसे गिने-चुने
लोगों को ढूँढ रहा हूँ
मुझे आग बोनी है
और अंगारे उगाने हैं

मेरा परिचय
उन सबका परिचय है
जो एक दूसरे को जाने बिना
आग के इस खेल में शरीक हैं

लुकाठा लिए मैं
बाज़ार में खड़ा हूँ
जो अपना घर
फूँक सकते हों
भीड़ से अलग हट जाएँ
मेरे साथ आ जाएँ

मंगलवार, 29 मार्च 2011

अजनबी आवाज़ें / सुभाष राय

शहर में घुस आए हैं
कुछ अजनबी लोग

हलचल है चौराहों पर
कानाफूसी चल रही है
दुकानों पर, दालानों में
चौपालों पर, जगह-जगह

घरों की खिड़कियाँ
दिन में भी बंद
रहती हैं आजकल
दरवाज़ों पर
ताले लटक जाते हैं
या भीतर से साँकल
चढ़ी होती है
बिजली कि घंटियों के तार
खोल देते हैं लोग
ताकि आने वाला आवाज़ दे
पहचाना जा सके
अजनबी आवाज़ों पर नहीं
खुलते हैं दरवाज़े

पार्कों में सन्नाटा है
बच्चे भी नहीं आते
अब वहाँ खेलने
पेड़ अकेले पड़ गए हैं
दिन भर ठकुआए
खड़े रहते हैं
शाम को भी अब
उनकी जड़ों के पास
चौपाल नहीं जमती

लोगो ने फूलों को
पानी देना बंद कर दिया है
उनमें कलियाँ आती हैं
पर खिल नहीं पातीं
न जाने कब, कौन
आकर उन्हें मसल जाता है
तितलियाँ दिखती ही नहीं
उनके टूटे हुए पंख
उड़ते रहते हैं इधर-उधर
डालियों पर लटके
शहद के खतोने
सूख गए हैं
जा चुकीं हैं
मक्खियाँ कहीं और

नदी के पानी में
अजीब सी थरथराहट है
वह परेशान है
अब उसके किनारे नहीं आती
झुंड की झुंड गायें
अपनी प्यास बुझाने
धूप से व्याकुल
चरवाहे नहीं आते
तट पर पानी पीने

कोई रोज़ आधी रात बाद
चुपके से आता है और
लाठियाँ पीटता है पानी पर
छुरे पर धार लगाता है
तलवारें तेज़ करता है
पास पड़ीं खोपड़ियाँ
टकराता, बजाता है

बच्चे छुट्टियाँ नहीं मना पाते
डरे हुए माँ-बाप की
सलाहें बंद कमरों में
कैद कर देती हैं उन्हें अकेले
स्कूल भी जाते हैं डरे-सहमे
जेल जैसा लगता है स्कूल
मध्यांतर में भी
बाहर नहीं निकलते
तरसते हैं आइस्क्रीम के लिए

सुबह-सुबह लोग
टूट पड़ते हैं अख़बारों पर
जानना चाहते हैं
क्या हुआ रात में
कोई घर तो नहीं लुटा
कोई हत्यारों के हाथ
मारा तो नहीं गया
कोई बच्चा तो नहीं
ग़ायब हुआ

अफ़वाहें उड़ती हैं
गर्म आँधियों की तरह
जो नहीं हुआ होता
वह भी सरसराता रहता है
कानाफूसियो में
विश्वास नहीं होता
मगर अविश्वास भी कैसे हो

गला कटा धड़ मिला है
रामगंज की पुलिया पर
दाँतों के निशान हैं
युवती के जिस्म पर
मोतीपुर के कुछ मकानों पर
लाल हथेलियों की
छाप देखी गई
बिल्कुल वैसी ही जैसी
लुटने के कुछ ही दिन पहले
सदर के कुछ घरों पर
देखी गई थी
मज़ार के पास
दो अलग-अलग
हाथों के कटे पंजे मिले हैं
एक पर राम गुदा हुआ है
दूसरे पर रहीम

लोग बेहद डरे हुए हैं
किचेन में काम करती
औरत को दिखती हैं
छायाएँ बाहर टहलती हुई
रात को छत पर
किसी के चलने की
ठक-ठक सुनाई पड़ती है
बाहर सड़क पर
कभी-कभी बहुत तेज़
भूँकते हैं कुत्ते
हवा से खड़कती हैं कुंडियाँ
अधजगी आँखें फैल जाती हैं
एक पल के लिए
इग्जास्ट फैन के पीछे
अपने घोंसले में
सोया कबूतर
फड़फड़ाता है पंख
और डरा देता है
लरजती शाम
काँपती सुबह
झनझनाती रात
इसी तरह दिन गुज़र रहा है
आदमी डर रहा है
मर रहा है

सुभाष राय का आलेख : वक्त की आवाज हैं शब्द


subhash rai
साहित्य-चिंतन
---------------
वक्त की आवाज हैं शब्द
डा. सुभाष राय 
अगर आप किसी पत्रकार, लेखक या  साहित्यकार से पूछें कि वह  आखिर  लिखता  क्यों हैं? उसे लिखने का  रोग है या मजबूरी या किसी खास किस्म की जरूरत या कुछ और? इससे उसे क्या हासिल होता है? तो वह  क्या जवाब देगा ? कोई कहेगा वह लिखकर प्रसन्नता का अनुभव करता है क्योकि बहुत कुछ जो वह चाहते हुए भी कह नहीं पाता है, कागज पर उतार देता है. यह विरेचन उसे आनंदित करता है. इसे स्वान्तः सुखाय  लेखन भी कहा जा सकता है. कोई कहेगा कि  वह परिवर्तन के लिए लिखता है. शब्दों में बड़ी शक्ति होती है और उनका  सधा हुआ प्रयोग जर्जर और जीर्ण को ध्वस्त कर  नए निर्माण की सम्भावना पैदा कर सकता  है. और भी तर्क हो सकते हैं पर  सच यह है कि जो लोग युगीन विषमताओं के खिलाफ चुप नहीं रह सकते,  तटस्थ नहीं रह सकते और तलवार भी नहीं उठा सकते, वे लिखते हैं. जो अपने समय के भीतर खड़े होकर उससे आमने-सामने  जबान लड़ाने का हौसला रखते हैं, उनका हाथ युग की नब्ज पर होता है. और केवल वही सार्थक लिख पाते हैं.  अगर आप की रचना में अपने वक्त की आवाज है तो वह अपने-आप बोलेगी, बड़ी नजर आयेगी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप के पास अपने  समय को और उसकी जरूरत को समझने की दृष्टि है या नहीं।
परिवर्तन को लक्ष्य करके जो  भी लिखा जाय, वह साहित्य ही हो, कोई जरूरी नहीं. एक पत्रकार भी लिखता है. वह अपनी कलम तात्कालिक महत्त्व के  मसाइल पर उठाता है. सामाजिक, राजनीतिक जड़ता के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, लोगों की तटस्थता के खिलाफ, सामाजिक विषमताओं के खिलाफ, सरकारी उदासीनता के खिलाफ और जो कुछ भी सड़ता, बजबजाता दिखायी पड़ता है, उसके खिलाफ। ऐसा लेखन पत्रकारीय भी हो सकता है और साहित्यिक भी। ज्यादातर स्वतंत्र और चेतन पत्रकार परिवर्तन के लिए लिखते हैं। यह अलग बात है कि उनका लेखन नियोजित और संस्थागत पत्रकारिता से निकलती तमाम परस्परविरोधी और अलक्षित आवाजों के बीच बहुत असर नहीं दिखा पा रहा है। पूंजी से नियंत्रित मीडिया ने जिस व्यावसायिक लेखन को प्रश्रय और विस्तार दिया है, उसकी तो चर्चा भी बेमानी है। वह तो सिर्फ धन कमाने का जरिया है। पत्रकारों को इसलिए लिखना होता है क्योंकि उन्हें इसके लिए वेतन मिलता है। एक साहित्यकार खबरों में अपने युग को ढूढ़ता है और यही बोध उसे साधारण पत्रकारीय फलक से ऊपर ले जाता है।  उच्च कोटि की रचना लिखी या कही नहीं जाती। वह सिर्फ होती है, भीतर चेतन के सबसे ऊर्जस्वित क्षेत्र में एक विस्फोट की तरह पैदा होती है और विद्युत की तरंगों की तरह विस्तार ग्रहण करती है। जिसके भीतर से रचना जन्म लेती है, उसे पता ही नहीं चलता। भाव की आत्यंतिक उत्कटता और विचार का सघन प्रवाह उसे आगे बढ़ाता है और एक छोर से दूसरे छोर तक नदी की धार की तरह बहा ले जाता है।
जैसे बादल का बरसना कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं होती। गर्मी सागर की सतह से वाष्प पैदा करती है। यह वाष्प ऊपर उठती है। सागर की इतनी विशाल सतह से उठती वाष्प उमड़ती-घुमड़ती हुई हवा के साथ बहती चली जाती है। दूर खड़ा एक पहाड़ उसे रोक देता है, ऊपर की ठंड उसे पानी में बदल देती है। हम बारिश देखते हैं तो सागर तक कहां पहुंचते? इसी तरह मनुष्य के भीतर विशाल आकाश में बाहर के समाज, देश और परिस्थिति की विडंबनाओं से पैदा हुए विचार और भाव के बादल सघन से सघनतर होते जाते हैं। समय का कोई क्षण उसमें विस्फोट पैदा कर देता है, उसे पिघला देता है और अतिचेतन से रचना बरसने लगती है। रचनाकार के सामर्थ्य से उसके भीतर स्थित कला स्वयं ही उसे धारण लेती है। बरसते मेघ का पानी जैसे घट में ठहर जाता है, वैसे ही रचना रचनाकार की मेधा में बुनी हुई संश्लिष्ट कला में उतरकर ठहर जाती है। यह साधारण आदमी के वश की बात नहीं। जो रचता है, उसे भी नहीं मालूम होता कि रचना आखिर कैसे हुई। इसलिए कहना पड़ेगा कि लिखना तो नियोजित कारोबार है लेकिन रचना स्वत:स्फूर्त कलात्मक स्फोट। वह रचनाकार की संवेदना, उसकी दृष्टि और उसके हेतु में स्वयं ही लिपटकर बाहर आती है। श्रेष्ठ रचना स्वयं ही स्वयं को रचती है, तभी तो वह केवल होती है।
रचनात्मक लेखन की विधाओं में कविता को श्रेष्ठतम दर्जा हासिल है. कविता क्या है? अक्सर यह सवाल किया जाता है। कोई नहीं जानता कि पहली कविता ने कब जन्म लिया, किसने सबसे पहले शब्द को कविता का रूप दिया लेकिन इतना कोई भी कह सकता है कि कविता ने दुख से ही जन्म लिया होगा। उमड़ कर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। दुनिया भर के विद्वानों, कवियों, आलोचकों ने कविता को परिभाषाओं में बांधने का काम किया। भारतीय मेधा ने स्वीकार किया कि रस ही काव्य है। जिसे पढ़ने या सुनने से आदमी के भीतर बहुत गहरे रस की अनुभूति हो। उसे महसूस हो कि जो बात कही गयी लगती है, वह उतनी ही नहीं है। वह जितना डूबे, उतना ही आनंद से सराबोर होता चला जाय। यह आनंद अभिव्यक्ति की सचाई से पैदा होता है। सुनने वाला या पढ़ने वाला वैसी ही अनुभूति अपने भीतर ढूंढ लेता है और यह अनुभूति की साम्यता ही उसे आह्लादित करती है। गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति से एकाकार होते ही आंखों में आंसू आ जाते हैं। इस तरह कविता व्यक्ति को अपने कथ्य के केंद्र की ओर खींच ले जाती है। वह कवि की तरह ही सोचने लगता है, अनुभव करने लगता है। अगर कोई कविता ऐसा नहीं कर पाती तो उसके कविता होने पर संदेह स्वाभाविक है।
पश्चिमी विद्वानों ने भी कविता को समझने-समझाने की कोशिश की। वर्ड्सवर्थ ने कहा कि कविता गहरे भावों का आकुलता भरा उफनता प्रवाह है। एमिली डिकिंसन ने कहा कि जब मैं कोई पुस्तक पढ़ती  हूं और वह मुझे इतना शीतल कर देती है कि कोई भी आग गरम न कर पाये, मैं समझ जाती  हूं कि वह कविता के अलावा और कुछ नहीं हो सकती है। तमाम परिभाषाओं के बावजूद समय के साथ कविता अपने रूप बदलती रहती है और इसीलिए वह किसी भी परिभाषा में बंधने से इंकार करती रही है। फिर भी उसे समझने के लिए हमेशा ही नयी-नयी परिभाषाएँ गढ़ने की कोशिशें होती रहती हैं। पूरी दुनिया में कविता के आंदोलन चलते रहे हैं। अलग-अलग दौर में कविता को अलग-अलग तरीके से समझने का प्रयास किया गया। पारंपरिक अनुशासन को आवश्यक मानने वाले लोगों का कहना है कि कविता में गेय तत्व होना ही चाहिए अन्यथा गद्य और काव्य में अंतर क्या रह जायेगा। परंतु इस नाते क्या जो भी गेय हो, उसे कविता कह देना समीचीन होगा? कविता की और भी जरूरतें होती हैं और उनके होने पर ही वह कविता होगी।
कवि अपनी बात सीधे नहीं कहता। वह उसे कलात्मक संक्षिप्ति के साथ व्यक्त करता है। इस कला में शब्द की व्यंजना, बिम्ब, प्रतीक, ध्वन्यार्थ आदि आते हैं। यही कविता को सीधे गद्य से अलग करते हैं। गेयता भी काव्य कला का एक तत्व है, लेकिन एकमात्र या अंतिम तत्व नहीं। और यह भी जरूरी नहीं कि किसी कविता को कविता तभी माना जायेगा, जब उसमें सारे तत्व समाहित हों। इसी अर्थ में गेयता न भी हो और बाकी तत्व हों तो भी कविता बन सकती है। कविता की सबसे बड़ी ताकत उसमें पढ़ने या सुनने वाले की उपस्थिति है, आम आदमी की उपस्थिति है। यह काव्य का प्रमुख और अनिवार्य तत्व है। अगर कोई कविता सारे अनुशासन से लैस है, अलंकार, छन्द, प्रतीक, बिम्ब और उत्तम भाषा-शैली से भी संपन्न है लेकिन उसका कथ्य लोगों की संवेदना को झकझोरता नहीं, उनमें गुस्सा, भय, क्रोध या प्यार नहीं पैदा नहीं करता तो उसे कविता कहने की कोई मजबूरी नहीं है। इसीलिए कविता करना बहुत कठिन और विरल बात है। कविता प्रयास और कल्पना से नहीं बनती। कवि जन्म लेता है, पैदा होता है। कोई भी कवि बन जाय, सहज संभाव्य नहीं है। शब्द जिसके हाथों में खेल सकते हों, अर्थ जिसके भाव के  अनुगामी हो, ऐसे लोगों को प्रकृति अलग से ही रचती है। समय उन्हीं के चरण चूमता है, जो समय के आगे चल सकते हैं, सच्चे सपनों को पहचान सकते हैं और यह काम केवल कवि ही कर सकता है।
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मिटकर आओ


नहीं तुम प्रवेश नहीं
कर सकते यहाँ
दरवाजे बंद हैं तुम्हारे लिए

यह खाला का घर नहीं
कि जब चाहा चले आये

पहले साबित करो खुद को
जाओ चढ़ जाओ
सामने खड़ी चोटी पर
कहीं रुकना नहीं
किसी से रास्ता मत पूछना
पानी पीने के लिए
जलाशय पर ठहरना नहीं
सावधान रहना
आगे बढ़ते हुए
फलों से लदे पेड़ देख
चखने की आतुरता में
उलझना नहीं
भूख से आकुल न हो जाना
जब शिखर बिल्कुल पास हो
तब भी फिसल सकते हो
पांव जमाकर रखना
चोटी पर पहुँच जाओ तो
नीचे हजार फुट गहरी
खाई में छलांग लगा देना
और आ जाना
दरवाजा खुला मिलेगा

या फिर अपनी आँखें
चढ़ा दो मेरे चरणों में
तुम्हारे अंतरचक्षु
खोल दूंगा मैं
अपनी जिह्वा कतर दो
अजस्र स्वाद के
स्रोत से जोड़ दूंगा तुझे
कर्णद्वय अलग कर दो
अपने शरीर से
तुम्हारे भीतर बांसुरी
बज उठेगी तत्क्षण
खींच लो अपनी खाल
भर दूंगा तुम्हें
आनंद के स्पंदनस्पर्श से

परन्तु अंदर नहीं
आ सकोगे इतने भर से
जाओ, वेदी पर रखी
तलवार उठा लो
अपना सर काटकर
ले आओ अपनी हथेली
पर सम्हाले
दरवाजा खुला मिलेगा

यह प्रेम का घर है
यहाँ शीश उतारे बिना
कोई नहीं पाता प्रवेश
यहाँ इतनी जगह नहीं
कि दो समा जाएँ
आना ही है तो मिटकर आओ
दरवाजा खुला मिलेगा।

- सुभाष राय

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

मुझमें तुम रचो

डा. सुभाष राय की कविता
मुझमें तुम रचो

सूरज उगे, न उगे

चांद गगन में उतरे, न उतरे
तारे खेलें, न खेलें
मैं रहूंगा सदा-सर्वदा
चमकता निरभ्र
निष्कलुष आकाश में
सबको रास्ता देता हुआ
आवाज देता हुआ
समय देता हुआ
साहस देता हुआ

चाहे धरती ही क्यों न सो जाय
अंतरिक्ष क्यों न जंभाई लेने लगे
सागर क्यों न खामोश हो जाय

मेरी पलकें नहीं गिरेंगी कभी
जागता रहूंगा मैं पूरे समय में
समय के परे भी

जो प्यासे हों
पी सकते हैं मुझे
अथाह, अनंत जलराशि हूं मैं
घटूंगा नहीं, चुकूंगा नहीं

जिनकी सांसें 
उखड़ रही हों टूट रही हों
जिनके प्राण थम रहे हों
वे भर लें मुझे अपनी नस-नस में
सींच लें मुझसे अपना डूबता हृदय
मैं महाप्राण हूं जीवन से भरपूर
हर जगह भरा हुआ

जो मर रहे हों
ठंडे पड़ रहे हों
डूब रहे हों
समय विषधर के मारक दंश से आहत
वे जला लें मुझे अपने भीतर
लपट की तरह
मैं लावा हूं गर्म दहकता हुआ
मुझे धारण करने वाले
मरते नहीं कभी
ठंडे नहीं होते कभी

जिनकी बाहें बहुत छोटी हैं
अपने अलावा किसी को
स्पर्श नहीं कर पातीं
जो अंधे हो चुके हैं लोभ में
जिनकी दृष्टि
जीवन का कोई बिम्ब धारण नहीं कर पाती
वे बेहोशी से बाहर निकलें
संपूर्ण देश-काल में समाया मैं 
बाहें फैलाये खड़ा हूं
उन्हें उठा लेने के लिए अपनी गोद में

मैं मिट्टी हूं, पृथ्वी हूं मैं
हर रंग, हर गंध
हर स्वाद है मुझमें
हर क्षण जीवन उगता-मिटता है मुझमें
जो चाहो रच लो
जीवन, करुणा, कर्म या कल्याण

मैंने तुम्हें रचा
आओ, अब तुम
मुझमें कुछ नया रचो

बुधवार, 8 सितंबर 2010

डॉ. सुभाष राय......... यह हाथ किसका है

यह हाथ किसका है
बार-बार मेरी जेब में उतरता हुआ
बेख़ौफ़, बेलौस
मुट्ठियाँ बंधते-बंधते खुली रह जाती हैं
दाँत भिंचना चाहते हैं
पर अपनी ही जीभ बीच में फँस जाती है
;
यह हाथ अक्सर मेरे कमरे में तैरता है
मेरे और मेरी बीवी के बीच आ जाता है
हम करवटें बदलते रह जाते हैं

एक ही घर में एक साथ होकर भी
अलग-अलग

मेरा बेटा माँगता है
नए कपडे, नए जूते, नयी साईकिल

मेरी कलाइयों पर हथकड़ी की तरह
बंध जाता है यह हाथ

मैं जानता हूँ
एक दिन वह बड़ा होगा
उसे भी नज़र आयेंगे ये हाथ
बेवजह बिस्तर से किचेन तक
दखल देते हुए

मैं चुप हूँ
शायद वह चुप न रह सके !

डॉ. सुभाष राय........ बर्फ़ और फूल



बर्फ़ और फूल
पैदा किये हैं पहाड़ ने
महज अपने बचाव के लिए

जिन्होंने नहीं देखीं हैं
पहाड़ों की रोशनीखोर सुरंगें
उन्हें झरनों के पास
बैठना और गीत गाना
बहुत अच्छा लगता होगा

वे दूधिया चोटियों पर
जम जाना चाहते होंगें
चट्टान की पोशाकों में

जिन्होंने नहीं देखीं हैं
पहाड़ों की गहरी सर्पिल घाटियाँ
उन्हें अच्छा लगता होगा
चट्टानों पर उगा वन
हिरन देखकर याद आतीं होंगीं
परिचय से गुज़री लड़कियाँ

जो नहीं देख सकें हैं
पहाड़ों का टूटना, उनका रेत बनना
वे सिर्फ़ इतना जानते हैं

कि पहाड़ गगनचुम्बी होते हैं
पहाड़ों पर बाढ़ नहीं आती
वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते
थक जाता है तूफ़ान
फूल-सी नरम
पड़ जातीं हैं आँधियाँ
जहाँ मैदान ख़त्म होता है
वहीँ से शुरू होता है पहाड़
मौसम का हमला
सिर्फ़ मैदानों पर होता है

शायद इसीलिए
लोग पहाड़ों पर जाते हैं
वहाँ जाकर आदमी
केंचुल छोड़ता है
और देवता बन जाता है ।

डॉ. सुभाष राय........ सागर

सागर मुझे अपने
सीने पर बिठाये रखता है
अपनी लहरों के फन पर

उसने ख़ुद ही उठा लिया था मुझे
तट पर अकेला पाकर
मैं ढ़ूँञ रहा था शब्द
उसकी गहराई के लिए
बार-बार चट्टानों से टकराकर
फेन-सी पसरती

उसकी लहरों के लिए
जीवन के प्रति उसकी
अनंत आत्मीयता के लिए

मैं लौटना नहीं चाहता था अपने शहर

लहरें बढ़ती तो छोड़ देता ख़ुद को उनके साथ
फेंक देतीं वे मुझे खुरदरी, नुकीली चट्टानों पर
लौटतीं तो दौड़ पड़ता उनके पीछे-पीछे

मछलियाँ भी होतीं मेरे साथ इस खेल में
बिल्कुल मेरे वहाँ होने से अनजान
भीगी रेत पर फिसलती हुईं

अच्छा लगता मुझे समुद्र के साथ खेलना
डर नहीं लगता - वह मुझे डुबो सकता है
वह मुझे पत्थरों पर पटक कर मार सकता है
मुझे झोंक सकता है भूखी शार्क के जबड़े में

मैं सम्मोहित-सा देखता रहता ज़मीन पर
बिछे आसमान को
हवा के झोंकों के साथ बहते, लहराते हुए
सुबह उसके गर्भ से निकलता ठंडा सूरज
और दिन भर जलकर अपने ही ताप से व्याकुल
थका हुआ बेचारा
अपना रथ छोड़ सागर में उतर जाता चुपचाप

सागर के पास होकर सागर ही हो जाता

मैं विशाल और असीम
मेरे भीतर होती लहरें सीपियाँ, मछलियाँ, मूँगे
और वह सब कुछ जो डूब गया

इस अप्रतिहत जलराशि में
समय के किसी अंतराल में

और तब सागर दहाड़ता
मेरी ही आवाज़ में
सुनामी आती मेरे भीतर चक्रवात की तरह
गरजने लगता मेरा मन
तट से दूर तक की

ज़मीन को निगलने की चाह से भरपूर
हवाओं की बाँह थामे उछलता आसमान की ओर
ज्वालामुखी का रक्ततप्त लावा बहने लगता मेरी नसों में
खदबदाते ख़ून की तरह धड़कने लगता मैं
समूचा हृदय बनकर

ख़ामोश होता तो सुनता मुझे अपने भीतर
पूछता नहीं मुझसे मेरे होने का मतलब
उसे पता होता मुझे कुछ नहीं चाहिए
सागर से, उसकी सत्ता से, उसकी अपराजेयता से

सागर को आख़िर क्या
चाहिए सागर से ?

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

'अब सुनो तुम' डॉ. सुभाष राय

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सुबह का सूरज
तुम्हारे भाल पर
उगा रहता है अक्सर
मेरे हृदय तक 
उजास किये हुए

मेरी सबसे सुन्दर
रचना भी कमजोर
लगने लगती है
जब देखता हूँ
तुम्हें सम्पूर्णता में

दिए की तरह जलते
तुम्हारे रक्ताभ नाख़ून
दो पंखडियों जैसे अधर
काले आसमान पर लाल 
नदी बहती देखता हूँ मैं 

सचमुच एक पूरा 
आकाश होता है तुम्हारे होने में 
जिसमें बिना पंख के
भी उड़ना संभव है
जिसमें उड़कर भी
उड़ान होती ही नहीं
क्योंकि चाहे जितनी दूर
चला जाऊं किसी भी ओर
पर होता वहीँ हूँ
जहाँ से भरी थी उड़ान

तुम नहीं होती तो
अपने भीतर की चिंगारी से
जलकर नष्ट हो गया होता
बह गया होता दहक कर
तुम चट्टान के बंद
कटोरे में संभाल कर
रखती हो मुझे
खुद सहती हुई
मेरा अनहद उत्ताप
जलकर भी शांत
रहती हो निरंतर

जो बंधता नहीं
कभी भी, कहीं भी
वह जाने कैसे बंध गया
कोमल कमल-नाल से
जो अनंत बाधाओं के आगे भी
रुकता नहीं, झुकता नहीं
कहीं भी ठहरता नहीं
वह फूलों की घाटी में
आकर भूल गया चलना
भूल गया कि कोई और भी
मंजिल है मधु के अलावा

सुन रही हो तुम
या सो गयी सुनते-सुनते
पहले तुम कहती थी
मैं सो जाता था
अब मैं कह रहा हूँ
पर तुम सो चुकी हो

उठो, जागो और सुनो
मुझे आगे भी जाना है. 
**************

'मेरे भीतर तुम उपस्थित रहोगे' डॉ. सुभाष राय


ओ मेरे पिता! तुम्हारा
अंश हूँ मैं सम्पूर्ण
मां के गर्भ में रचा
तुमने मुझे अपने लहू से 

तुमसे मुक्त कैसे
हो पाऊंगा कभी
कैसे वापस लौटा सकूँगा तुझे
उसका अंश भी जो
तुमने दिया है मुझे 
सब कुछ निछावर करके भी

अपने आंसुओं के साथ
रखा तुमने मुझे
जो करुणा और प्रेम
पाता हूँ अपने भीतर
तुम्हारी संवेदना से सिंचित है वह
कैसे विछड़ सकता हूँ मैं
तुमसे, तुम्हारे आंसुओं से

मैं जानता हूँ तुम रहोगे
सदा, सर्वदा मेरी आत्मा में
ज्योति की तरह दीप्त
मेरी नसों में बहते हुए
शताब्दियों के इतिहास की तरह
समय में ओझल वर्तमान की तरह
युग-युगों में फैले
भविष्य की तरह

भले ही तुम्हारा शरीर थम जाये
तुम्हारी हड्डियाँ तुम्हारा बोझ
उठाने से मना कर दें
तुम्हारा ह्रदय धड़कने से
इनकार कर दे
भले ही तुम संसार को
उसके पार्थिवत्व को
किसी भी पल अस्वीकार कर दो
पर मैं तुम्हारा मूर्त स्वीकार हूँ
तुम्हारा पूर्ण प्राकट्य हूँ 
मेरे भीतर तुम उपस्थित रहोगे
तब भी, जब नहीं होगे
किसी जागतिक दृश्य में

मां ने तुम्हारी प्रतिकृति में
जो नवचैतन्य सौंपा था तुझे
उसकी प्रथम श्वांस के साक्षी हो तुम 
तुम्हारी बाँहों में अनंत
अंधकार से मुक्ति पाई मैंने
अपनी अजस्र निश्छलता से
सींचकर तुमने मनुष्यत्व दिया मुझे
जब तक आसमान के नीचे
मनुष्य होगा, मैं हूँगा, तुम होगे

मैं जब कभी हताश होता हूँ
थक जाता हूँ, असहज हो जाता हूँ
अपने कंधे पर महसूस करता हूँ
तुम्हारे खुरदरे हाथ
और निकल आता हूँ
नैराश्य के विकट व्यूह से
जीवन का पहिया हाथों में
सम्हाले युद्ध को तत्पर
अभिमन्यु की तरह

जब कभी आत्मीय प्रवंचनाएं
क्रोधाविष्ट हो घेरतीं हैं मुझे
छल-छद्म के साथ
उपस्थित होतीं हैं
तुम्ही मुझे मृत्यु से संवाद
की शक्ति सौंपते हो
और मैं यमराज से भी नहीं डरता
नचिकेता हो जाता हूँ

जब कभी संशय में होता हूँ
समरभूमि के बीच में
लडूं या मुक्ति पा लूं रण से
संघर्ष और कर्तव्य के संबंधों
को समझने में असमर्थ
हो जाता हूँ पूरी तरह
मेरे भीतर से निकलकर
सामने आ जाते हो
पटु महानायक कृष्ण की तरह 
पलायन की ओर
रथ हांकने से रोक लेते हो
मेरा अर्जुन उठ खड़ा होता है
अपने गांडीव के साथ
याद आ जाता है जीवन
का आप्त वाक्य-
मामनुस्मर युद्ध च

मैं जानता हूँ तुम कुछ नहीं
कुछ भी नहीं चाहते मुझसे
पर मैं कुछ देना चाहता हूँ
सिर्फ यही है मेरे पास
लो, मैं देता हूँ वचन
तम्हे कभी आहत नहीं करूँगा
दुःख नहीं दूंगा
बना रहूँगा
तुम्हारा अभिमन्यु
तुम्हारा नचिकेता
तुम्हारा अर्जुन
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डॉ. सुभाष राय

जन्म : : जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश के जनपद मऊ नाथ भंजन में स्थित एक छोटे से गांव बड़ागांव में।
शिक्ष-दीक्षा :मऊ के डी सी एस के डिग्री कालेज से हिंदी, अंग्रेजी और मनोविज्ञान विषयों के साथ स्रातक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आगरा विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध साहित्य संस्थान के.एम.आई. से हिंदी भाषा और साहित्य में स्रातकोत्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहीं से विश्वविद्यालयीय शिक्षक योग्यता परीक्षा नेट पास की, विधि की पढ़ाई पूरी की और उत्तर भारत के विख्यात संत कवि दादूदयाल के रचना संसार पर शोध किया। डाक्टरेट मिली।
प्रकाशन :जब मैट्रिक का विद्यार्थी था, तभी से जनवार्ता, गांडीव जैसे काशी के समाचारपत्रों में कविताएं, कहानियां और आलेख प्रकाशित होने लगे थे। समसामयिक विषयों पर एक हजार से ज्यादा लेख प्रकाशित। हिंदी क्षेत्र की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं लगातार लेख, व्यंग्य, समीक्षा और कविताओं का प्रकाशन।
इन्टरनेट पर :अपने ब्लॉग ‘बात-बेबात’ और 'साखी' के अलावा अनेक प्रतिष्ठित ई-मैग्ज़ींस में कवितायेँ और अन्य रचनाएँ. विश्व कविता संग्रह कविता कोश में रचनाएँ शामिल.
प्रसारण :प्रयाग में निवास के दौरान आकाशवाणी इलाहाबाद से कई वर्षों तक कविता, कहानी और वार्ताओं का प्रसारण।
सम्मान-पुरस्कार :: संस्कार भारती, आगरा विकास संघ तथा कई अन्य साहित्यसेवी संस्थाओं की ओर से सम्मान। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के प्रतिष्ठापूर्ण पुरस्कारों की चयन समिति का सदस्य रहा.
विशेष : नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर डा. उमा शंकर तिवारी, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक डा. कन्हैया सिंह, नयी कविता के शीर्ष रचनाकारों में शामिल श्रीराम वर्मा के अलावा हिंदी के अनन्य साधक डा रघुवंश, जगदीश गुप्त, मार्कंडेय जी, दूधनाथ सिंह आर प्रो हरिमोहन के सानिध्य में बैठकर साहित्य पढ़ने का अवसर मिला। केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के पत्रकारिता विभाग में छः माह तक अध्यापन
संप्रति :प्रयाग के नार्दर्न इंडिया पत्रिका ग्रुप में सेवा शुरू करके तीन दशकों की इस पत्रकारीय यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव पर. अमृत प्रभात, आज, अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद इस समय आगरा में एक मिड-डेयर दैनिक समाचारपत्र डीएलए से संपादक विचार के रूप में जुड़ा हुआ हूं।
संपर्क : ए-158, एमआईजी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा (यूपी)
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